Kavita Ki Chingari (Hindi)कविता की चिंगारी Poem by S.D. TIWARI

Kavita Ki Chingari (Hindi)कविता की चिंगारी

कविता की चिंगारी

कविता की चिंगारी को, मशाल बनाकर मानूंगा।
शब्दों को गूँथ माला, कमाल बनाकर मानूंगा।

दिखलायेगी राह प्रीति की, ऐसी जयोति जलाऊंगा।
तम, उर के निकाल, दिलों में प्रकाश मैं भर जाऊंगा।
चल पड़े जो शांति, अहिंसा और विकास के पथ पर,
युवा शक्ति को प्रेम का, भूचाल बनाकर मानूंगा।

सूरज के उगते ही और कमलदल खिलते ही।
दिन भर के आये नए विचार, शाम के ढलते ही।
लेकर कलम शब्दों में ढाल, साहित्य के सागर में,
सुन्दर सी एक नाव विशाल, बनाकर मानूंगा।

राजनीति के दलदल, और कुशासनके घर में।
वही बोलूंगा, जो कुछ देखूंगा,झांक कर निडर मैं।
गाड़े हुए सब लोक विरुद्ध, उन कार्य कलापों को,
खोद डाले जड़ से जो, कुदाल बनाकर मानूंगा।

शब्दों को जोड़ तोड़ कर, और कुछ मीठे रस भर।
वेदना और संवेदना की गहराई तक जाकर।
जीवन के सभी पहलुओं और दिलों को छूकर,
कविता को जीवन का सुर ताल बनाकर मानूंगा।

भूत को टटोलते, भविष्य के गर्भ में झांककर।
सोच की गहराई में डूब, भाव को निकालकर।
अंतरिक्ष के पार तक, झांकने की खिड़की खोल,
दिव्यदृष्टि दूरबीन विकराल बनाकर मानूंगा।

(C)एस. डी. तिवारी

Wednesday, September 19, 2018
Topic(s) of this poem: philosophy
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