स्वयम्‌ को ही पहचान नही पाया Poem by Kezia Kezia

स्वयम्‌ को ही पहचान नही पाया

Rating: 5.0

भाषा को पहचाना

धर्म को पहचाना

भूमि पर खिची

रेखाओं कों पहचाना

ज्ञान के प्रवचन को पहचाना

संस्कृति को जाना

ब्रह्माण्ड में विद्यमान

ऊर्जा को पहचाना

उपमेय और अलंकार को पहचाना

केवल

स्वयम्‌ को ही पहचान नही पाया

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Monday, May 1, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 01 May 2017

कहते हैं कि स्वयं से साक्षात्कार हो जाना जीवन की सब से बड़ी उपलब्धि है. अन्य बातों का ज्ञान दूसरे स्थान पर है. बहुत सुंदर प्रस्तुति.

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