काश! Poem by Megha Bairwa

काश!

ए काश, काश तू ना होता
ना हंसा चलो पर ना रोता
भवसागर पार उसी ने किया
जो काश के पाश से बच निकला
चंद दुखों से घबड़ाकर
द्वेष से चाहे मोह जाल से
इक बार थाम जो हाथ लिया
संतोष सुखों का पान किया
इक कतरा भी न बच पाया
जा मिल लिया जो हाथ तेरा ।

ए काश, काश तू ना होता
ना हंसा चलो पर ना रोता
अलंकार विविध जो लाद रखे
तुझसा मनोहर कोई कहाँ दिखे
मृग कस्तूरी तेरा दर्पण
तू कहाँ साथ निभाता है
तू तृष्णा है, वो कृष्णा है
जो गोपी को बहलाता है
नित स्वप्न सहस्त्र दिखलाता है
स्मितहास्य करूँ, कभी करूँ रुदन
बस रूह जले और स्याह बदन
जरखेज, मिट्टी ही बन पाती
पाषाण कब जीवन पनपाता है
पाषाण सा निष्ठुर वही बना
जो ग्रास काश का बनता है।

ए काश, काश तू ना होता
ना हंसा चलो पर ना रोता
नवजीवन दे या मार ही दे
इक राह तो दे, इक राह तो दे
इक राह पकड़ आगे तो बढ़ूँ
ना दायें चलूँ, ना बाएं चलूँ
जब से हाथ थामा तूने
मझधार खड़ा मैं प्रतिमा बनकर
क्या ही पा लेगा चलकर
दिकभ्रमित करवाता है
क्या हो गर आगे हार मिली
क्या हो गर नामे हवा चली
क्या हो गर मिला तमस कानन
आगे न बढ़ बस जा तू ठहर
क्या हो गर कभी न हुई सहर।

ए काश, काश तू ना होता
ना हंसा चलो पर ना रोता
भय क्षोभ शीश पर बरपाकर
चाहे फुसलाकर या डरपाकर
प्रभुत्व तेरा ही छाया रहे
तेरी चाह सदा ही माया रहे
क्यूँ कदम नहीं बढ़ने देता
संतोष ठहरने ना देता।
गर हो संतोष कुटिया भी घर
घर कारा यद काश का वास हुआ
जुनून बेहतर की चाहत का
कुछ ऐसा प्रलय ढा ही गया
वृहद आनंद की प्रत्याशा में
छोटी खुशियां खा ही गया

ए काश, काश तू ना होता
ना हंसा चलो पर ना रोता
उम्मीदों की पुलिया टूट गई
तू तिनके स सहारा बना रहा
ना बचने दिया न बहने दिया
मझधार छोड़ मुस्कुरा रहा।
मैं अजेय हूँ, मेरी ही विजय
जश्न जीत का मना रहा
जब आँख खुली निद्रा टूटी
निद्रा टूटी, तृष्णा न गई
सर कैसी मेघा छाई रही
सच का प्रकाश न दिख पाया
हाय रे! कोसे किस्मत को
खेत चिरैया ने खाया।
मेघा छटी, नभ धवल हुआ
नभ धवल हुआ, अम्बरीश उगा
इस काश काश के फेरे में
जीवन यूं ही बर्बाद हुआ
एकांत मूक मन कोटर में
अब मात्र शेष अनुताप रहा।

ए काश, काश तू ना होता
ना हंसा चलो पर ना रोता।

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