Sandesh Lives


मिथिला / Mithila Poems - Poem by Sandesh Lives

((【गाँव घर के कोनो ~ कोनो छौरी,
बड़ उकट्ठी,
'बर' के टी गंजन क के राखी दैत अच्छी।।
जो टौएक देवै,
त् कहत गे दाय बिध होयत छै त गैर नै पढ़बै ।।
'बर्' और बर् के खन्दान क त् उकैट क रैख दैत छै ।।
ज दूल्हा किछू कहलैथ त हुनका जबाब दैत छैथ मिथिलानि सब।))) 】

<> गैर नै हम दैत छी, दूल्हा द रहलो आशीष यो, , , , , ,
सासुर में जुनि छाती तनियो, रहू लिबौने शीश यो॥

(1) ~गर्देन में ताऊणी लगबै छी, गरदामि नै आनलो, ,
नाक धरै छी नाथब तै ल हॉट के बाच्छा बनलो ।।
आहा के जन्मोलैं तै ल बाबू लेलैन फीस यो, ,
गैर नै, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ||
(2) ~मौसा हरकल मौसी गुरकल, पिसा आहा के भरुआ,
दूल्हा आहा मुदा रूसियों सासु के दुलरुआ ~ बहिन ल हम घघरी माँगा देव, बाबू ल कट पीस यो, , , , , ,

गैर नै, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , |
(3) ~ खेत बेचीं क साइकिल देलैन्, महीस बेच क रेडियो,
काकी क दीसऱ बेटी ई जेतैन बीयाहल कहियो।।
बरु हम पहिरौ गुदरी दूल्हा, दिबु लाख बारिश यौ ।।।
ससुर में जुनि, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ||
गैर नै दैत छी दूल्हा, , , , , , , , , , , , , , , //

Topic(s) of this poem: culture


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Poem Submitted: Monday, January 11, 2016



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