ब्रिगेडियर: सादे कपड़े, फौलादी क़दम Poem by Pushp Sirohi

ब्रिगेडियर: सादे कपड़े, फौलादी क़दम

वो
सादे कपड़े पहनता है—
ना चमकदार सितारे,
ना शोहरत का शोर,
जैसे उसने बहुत पहले
सीख लिया हो
कि असली रुतबा
दिखाया नहीं जाता,
महसूस कराया जाता है।

भीड़ में खड़ा हो
तो कोई पहचान नहीं पाता,
पर जब चलता है—
ज़मीन अपने आप
सीधी हो जाती है,
और परछाइयाँ
उसके क़दमों के साथ
सैल्यूट करती चलती हैं।

उसकी चाल में
जल्दी नहीं होती,
क्योंकि उसने
भागते हुए नहीं,
डटे रहकर
लड़ना सीखा है।

उसकी आँखों में
गुस्सा नहीं—
हुक्म रहता है,
और उस हुक्म में
कोई आवाज़ नहीं,
फिर भी
पूरा माहौल
लाइन में आ जाता है।

वो बोलता है
तो भाषण नहीं देता,
बस दो शब्द कहता है—
और लोग
उन्हें
आदेश नहीं,
ज्ञान समझकर
अपने जीवन में उतार लेते हैं।

चाहे वो
लोगों से भरा हुआ
स्टेडियम हो—
जहाँ हज़ारों नज़रें
एक साथ देख रही हों,

या फिर
कोई सुनसान कमरा—
जहाँ सन्नाटा
खुद से सवाल कर रहा हो,

उसकी मौजूदगी
दोनों जगह
एक जैसी रहती है—
क्योंकि उसका असर
भीड़ से नहीं,
बुद्धि और अनुभव से आता है।

उसके जूतों पर
धूल है,
क्योंकि वो
सिर्फ़ रास्तों पर नहीं चला—
वो
मोर्चों, जिम्मेदारियों
और फैसलों से होकर गुज़रा है।

उसके हाथ
अक्सर खाली रहते हैं,
पर उन्हीं हाथों से
कई टूटे हुए लोग
फिर से
सीधे खड़े होना
सीखते हैं।

वो आगे खड़ा नहीं होता—
वो पीछे रहता है,
ताकि ज़रूरत पड़े
तो आदेश देने से पहले
ढाल बन सके।

उसने सिखाया है
कि सेना सिर्फ़ वर्दी नहीं,
सेना एक आदत है—
समय पर उठने की,
सच बोलने की,
और आख़िरी आदमी तक
खड़े रहने की।

जब हालात
उलझते हैं,
तो लोग रास्ता ढूँढते हैं—
और जब हालात
बिखरते हैं,
तो लोग
उसकी मौजूदगी ढूँढते हैं।

शहर ने
धीरे-धीरे ये समझ लिया है—
सादे कपड़ों में रहने वाला
ये आदमी
कोई आम कहानी नहीं,

ये वो है
जिसके नाम से
अफवाह नहीं चलती,
अनुशासन चलता है।

रात गहरी हो
या हालात भारी—
उसकी परछाईं
और भी लम्बी हो जाती है,
जैसे कह रही हो—

"पंक्ति मत तोड़ो,
मैं यहीं हूँ।"

और तभी
नाम लिया जाता है—
आवाज़ ऊँची करके नहीं,
सम्मान से, भरोसे से—

(ब्रिगेडियर) पुष्प सिरोही

वो जो
ताशन नहीं दिखाता,
पर जब खड़ा होता है—
तो
भीड़ हो या सन्नाटा,
दोनों अपने आप
सावधान हो जाते हैं।

— (ब्रिगेडियर) पुष्प सिरोही ✍️🫡🖤

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