कभी हाथों में हल था,
कभी कंधों पर भार,
कभी मिट्टी से रिश्ता था,
कभी पसीने से संसार।
नाम अलग थे,
काम अलग थे,
पर श्रम का मूल्य कहाँ था?
जिसने शहर बसाए,
उसी के हिस्से
क्यों इतना अँधेरा था?
कहा गया—
अपनी सीमा पहचानो।
वह मुस्कुराया और बोला—
सीमा तुमने खींची थी,
मिट्टी ने नहीं।
तुमने जाति की दीवार बनाई,
उसने ईंट उठाकर
तुम्हारा महल बनाया।
तुमने कहा—
"नीचे रहो।"
वह बोला—
"नीचे मैं नहीं,
तुम्हारी सोच पड़ी है।"
समय बदला,
सड़कें बदलीं,
हाथ में हल के साथ
हॉर्न भी आया,
डमरू की जगह
ट्रैक्टर गरजा—
और इतिहास ने पूछा:
'जिस श्रम को तुमने छोटा कहा था,
आज उसी श्रम के बिना
तुम्हारा बड़ा कौन है? "
अब वह सिर झुकाकर
अनुमति नहीं माँगता,
अपने श्रम का
अधिकार माँगता है।
न बदला चाहिए,
न किसी का अपमान—
बस इतना हिसाब चाहिए:
जिसने समाज उठाया,
उसे समाज में
बराबर स्थान क्यों नहीं?
गुजरात की मिट्टी गवाह है—
व्यापार से बाज़ार बनते हैं,
पर श्रम से सभ्यताएँ बनती हैं।
इसलिए आज
शूद्र की आवाज़ को
दया मत समझना—
यह उस हाथ की आवाज़ है
जिसने सदियों तक
दूसरों का संसार बनाया।
अब वही हाथ
अपना इतिहास लिखेगा।
कलम भी अपनी,
मिट्टी भी अपनी,
मेहनत भी अपनी—
और भविष्य भी अपना।
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