मैं तुम्हें चाहूँ Poem by Pushp Sirohi

मैं तुम्हें चाहूँ

मैं तुम्हें चाहता हूँ—
इस तरह जैसे प्यास
पहली बारिश की खुशबू चाहती है।

मैं तुम्हारे होंठों को नहीं—
उनसे निकलती
वो अधूरी-सी बात चाहता हूँ
जो मेरे दिल की दीवारों पर
धीरे-धीरे लिख जाती है।

मैं तुम्हारी आवाज़ चाहता हूँ—
वो नहीं जो सब सुनते हैं,
वो… जो सिर्फ मुझे सुनाई देती है,
जब तुम मेरा नाम
धीरे से बोलती हो—
और मेरे भीतर
कई जन्म जाग जाते हैं।

मैं तुम्हारे बाल चाहता हूँ—
काली रात की तरह,
जो उँगलियों में उलझकर
दिन की सारी थकान खोल दे।
मैं उन्हें छूना चाहता हूँ
जैसे कोई यात्री
घर के दरवाज़े को छूता है—
यक़ीन के साथ।

मैं तुम्हारी हँसी चाहता हूँ—
क्योंकि उसमें
मेरे दुख की रीढ़ पिघलती है,
और मेरे भीतर का आदमी
फिर से नरम हो जाता है।

कभी-कभी
मैं तुम्हारे ग़ुस्से को भी चाहता हूँ—
क्योंकि उसमें
तुम्हारा सच खड़ा रहता है,
और सच से सुंदर
कुछ भी नहीं होता, प्रिये।

मैं तुम्हारे पास रहना चाहता हूँ—
लेकिन ज़िद की तरह नहीं,
मैं तुम्हें चाहना चाहता हूँ
इबादत की तरह—
जहाँ प्रेम
स्वार्थ नहीं, रोशनी बन जाता है।

तुम्हारा होना
मेरे भीतर एक मौसम है—
जो मेरे चले जाने पर भी
मेरे कमरे में
खुशबू बनकर रह जाता है।

मैं तुम्हें चाहता हूँ—
हर सुबह की पहली सांस में,
हर रात की आख़िरी दुआ में,
और हर उस पल में
जब मैं खुद से हार कर भी
तुम्हारे नाम से जीत जाता हूँ।

मैं तुम्हें चाहता हूँ—
मगर केवल शरीर नहीं,
मैं तुम्हारी रूह का ठहराव चाहता हूँ,
तुम्हारी आँखों का भरोसा चाहता हूँ,
वो सुकून…
जो दुनिया में कहीं नहीं,
सिर्फ तुम्हारे होने में मिलता है।

और अगर कोई पूछे
"इतना क्यों? "
तो मेरा जवाब बस इतना होगा—
क्योंकि तुम्हारे बिना
मेरे शब्द अधूरे हैं…
और तुम्हारे साथ
मेरी खामोशी भी
गीत बन जाती है।

— पुष्प सिरोही

मैं तुम्हें चाहूँ
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success