धन का घमंड नहीं—धर्म का गौरव Poem by Pushp Sirohi

धन का घमंड नहीं—धर्म का गौरव

तू कहता है—धन के ढेर पर
क्यों रातें जागता है मनुष्य,
मैं कहता हूँ—
जिसके भीतर राष्ट्र-धर्म जगा हो,
वो सोने के लिए नहीं जगता—
वो इतिहास के लिए जागता है।

तू पूछता है—
क्या धन स्वर्ग खरीद सकता है?
मैं उत्तर देता हूँ—
स्वर्ग बिकता नहीं,
स्वर्ग तो वही पाता है
जो ज़रूरत पड़े तो
अपनी सांस भी मातृभूमि पर चढ़ा दे।

क्या सोना मौत रोक सकता है?
नहीं!
मृत्यु तो देवता भी नहीं टालते,
पर वीर उसे चुनौती देता है,
वो मरकर भी अमर हो जाता है,
उसका नाम
कभी 'कब्र' नहीं बनता,
वो 'कीर्ति-स्तंभ' बन जाता है।

क्या सोना प्रेम खरीद सकता है?
क्या दोस्ती बिकती है?
नहीं!
भारत की मिट्टी में
प्रेम सिक्कों से नहीं,
संस्कारों से उगता है,
यहाँ दोस्ती
रक्त से लिखी जाती है,
और निभाई जाती है
कसमों की तलवार से।

मुझे धन नहीं चाहिए,
मुझे चाहिए—
सिर ऊँचा, इरादा सच्चा,
और हृदय में धर्म की आग।
क्योंकि
सोना केवल चमक है,
पर चरित्र सूरज है—
जो खुद जलकर भी
दुनिया को रोशनी देता है।

तू कहता है—
मुस्कान, सादगी, संयम चुन,
मैं कहता हूँ—
हाँ!
पर याद रख—
संयम कायरता नहीं,
यह वीरता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

तू कहता है—
ज्ञान के रास्ते चल,
मैं कहता हूँ—
ज्ञान वो धन है
जिसे कोई लूट नहीं सकता,
क्योंकि यह
मस्तिष्क में बसता है,
और समय के सामने
अडिग खड़ा रहता है।

और सुन!
मैं उन हाथों को सलाम नहीं करता
जो मिट्टी खोदकर
सोना निकालते हैं,
मैं उन हाथों को सलाम करता हूँ
जो सीमा पर
दुश्मन की नींद छीनते हैं,
और अपने देश की शांति लिखते हैं।

धन का घमंड छोड़ दे,
क्योंकि
भारत का वीर
सिक्कों से नहीं चलता,
वो चलता है
मातृभूमि की
शपथ और सम्मान से।

धन रह जाएगा यहीं
कागज़, पत्थर, धातु बनकर—
पर जो कर्म तू कर जाएगा,
वो बन जाएगा
राम का मर्यादा-पथ,
अर्जुन का धनुष,
और भगतसिंह की आग।

इसलिए आ!
आज मैं तुझे सिखाता हूँ
भारत का असली वैभव—
धन नहीं…
धर्म, शौर्य, प्रेम, और त्याग।
--पुष्प सिरोही

धन का घमंड नहीं—धर्म का गौरव
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