कभी हाथ में डंडा था,
कभी गले में डमरू,
आहट से पहले
आवाज़ करनी थी—
"हटो… कोई आ रहा है।"
समय ने करवट बदली,
डंडा छोटा पड़ गया,
डमरू की थाप
शहर के शोर में खो गई।
फिर वही हाथ
पहियों से जुड़ गए—
साइकिल चली,
बैलगाड़ी चली,
ट्रक चला,
ट्रैक्टर चला,
और फिर—
हॉर्न बजा।
पीं… पीं…
पों… पों…
जिस आवाज़ को कभी
दूरी बनाए रखने का आदेश मिला था,
आज वही आवाज़
**सड़क के बीचोंबीच
अपनी मौजूदगी दर्ज करती है।
कल डमरू कहता था—
"मैं आ रहा हूँ, दूर रहो।"
आज हॉर्न कहता है—
"रास्ता दीजिए,
मैं भी इसी सड़क का हिस्सा हूँ।"
क्या विडंबना है—
कभी आवाज़
पहचान की निशानी थी,
आज आवाज़
अधिकार की घोषणा है।
डंडे से डमरू,
डमरू से पहिया,
पहिए से इंजन,
और इंजन से हॉर्न—
यह केवल तकनीक की यात्रा नहीं,
सामाजिक परिवर्तन की ध्वनि है।
अब सड़क पर
हज़ारों वाहन हैं,
हज़ारों हॉर्न हैं,
हज़ारों आवाज़ें हैं—
और उनमें एक आवाज़
उस इतिहास से आती है
जिसे कभी
चुप रहने की शिक्षा दी गई थी।
तो अगर आज
सड़क पर शोर कुछ ज़्यादा है,
तो नाराज़ मत होना—
सदियों की ख़ामोशी थी,
थोड़ा हिसाब तो हॉर्न भी माँगेगा। 😏
डमरू की थाप से
हॉर्न की आवाज़ तक—
सफ़र लंबा था,
पर पहिए रुकने वाले नहीं।
क्योंकि अब
वह सिर्फ़ रास्ते पर नहीं चलता—
**अपना रास्ता बनाता है।**
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