सादे कपड़े, लम्बी परछाइयाँ Poem by Pushp Sirohi

सादे कपड़े, लम्बी परछाइयाँ

वो
हमेशा सादे कपड़े पहनता है—
ना चमक,
ना दिखावा,
जैसे उसे पता हो
कि असर
रंगों से नहीं,
मौजूदगी से होता है।

भीड़ में खड़ा हो
तो अलग नहीं दिखता,
पर जब चलता है—
परछाइयाँ
उसके साथ चलने लगती हैं।

उसके जूतों पर
धूल जमी रहती है,
क्योंकि वो
रास्तों से नहीं,
वक़्त से होकर गुजरता है।

बोलता कम है,
पर उसकी खामोशी
अक्सर
पूरे कमरे की आवाज़
बदल देती है।

लोग पूछते हैं—
"ये कौन है? "
और जवाब
नाम में नहीं मिलता,
तजुर्बे में मिलता है।

उसके हाथ खाली रहते हैं,
फिर भी
कई किस्मतें
उन्हीं हाथों से
सीधी हो जाती हैं।

वो आगे नहीं चलता—
थोड़ा पीछे रहता है,
ताकि अगर कोई डगमगाए
तो
परछाईं नहीं,
सहारा बने।

शहर ने
धीरे-धीरे समझ लिया है—
सादे कपड़े पहनने वाला ये आदमी
कोई आम कहानी नहीं,

ये वो है
जिसके साथ खड़े होने से
आदमी
अपने क़दमों पर
यकीन करने लगता है।

और जब रात गहरी होती है—
उसकी परछाईं
और भी लम्बी हो जाती है,
जैसे कह रही हो—

"जब तक मैं हूँ,
कोई अकेला नहीं।"

— पुष्प सिरोही ✍️

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success