आओ…
मेरी देहरी पर कदम रखो धीरे से,
जैसे सावन की पहली बूंद
मिट्टी को छू ले—
और धरती मुस्कुरा उठे।
सुनो प्रिये—
तुम मेरे जीवन की ऋतु हो,
मेरे भीतर की पूजा हो,
मैं तुम्हें किसी ताज की तरह नहीं,
किसी "मंत्र" की तरह संभालता हूँ—
जहाँ धूप भी तुम,
और आरती की लौ भी तुम।
मैं तुम्हें बुलाता हूँ—
किसी भूख से नहीं,
उस प्राचीन चाह से
जो सभ्यताओं के जन्म से पहले
धड़कनों में भाषा बनकर थी।
आओ…
मेरे शब्दों को
चूड़ियों की खनक दे दो,
मेरी सांसों को
गंगा-जल की शुद्धि दे दो,
मेरी धड़कनों को
मृदंग की लय दे दो—
और मेरे "आज" को
तुम अपना "घर" बना दो।
प्रिये—
मैं तुम्हारी बाहों में
कोई जीत नहीं चाहता,
मैं तो बस
अपने अस्तित्व का ठहराव चाहता हूँ—
जहाँ प्रेम
रोज़ नया होकर भी
सच्चा रहे।
मैं तुम्हारे माथे पर
अपनी हथेली की ठंडक रखकर
बस इतना कहूँ—
"दुनिया चाहे जितनी बदल जाए,
मेरी चाहत नहीं बदलेगी…"
मैं चाहता हूँ
तुम्हारी आँखों में
वो उजाला ठहरे
जो दीया जलने के बाद
घर में रह जाता है—
और अंधेरा हार जाता है।
आओ…
मेरे पास बैठो,
मेरे हाथों में अपना हाथ रखो,
मेरी हथेलियों की गर्मी में
थोड़ा सा भरोसा रखो—
क्योंकि मैं
तुम्हें सिर्फ देखना नहीं,
निभाना जानता हूँ।
मैं तुम्हें दूँगा
शहद-सी मीठी बातें नहीं—
मैं दूँगा
गुड़ की तरह देसी मिठास,
जो धीरे-धीरे घुलकर
रूह तक उतर जाती है।
प्रिये—
तुम्हारे नाम से
मेरी सांसें जागती हैं,
तुम्हारे स्पर्श से
मेरे भीतर का आकाश
तारों से भर जाता है।
और जब रात
खामोशी की चादर ओढ़ ले—
तो मेरी इच्छा
किसी पाप की तरह नहीं,
एक प्रार्थना की तरह उठे—
कि तुम मेरी देह नहीं,
मेरे जीवन का अर्थ बनो।
आओ…
मेरे घर की दीवारों में
अपना नाम लिख दो,
मेरे मन की मिट्टी में
अपनी खुशबू रख दो,
और सुबह होने तक
मेरे प्रेम के पास ठहरो—
क्योंकि सच्चा प्रेम
सिर्फ मिलन नहीं—
ये सभ्यता की पहली भाषा है,
और मैं…
उस भाषा में
बस तुम्हारा नाम बोलना चाहता हूँ।
— पुष्प सिरोही
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