अवसर Poem by Pushp Sirohi

अवसर

Rating: 5.0

मेरे दोस्तों,
अवसर
दरवाज़ा खटखटाकर नहीं आता—
वो आता है
चुपचाप।

कभी
एक साधारण-सी सुबह बनकर,
कभी
किसी अनजान-से फोन कॉल बनकर,
कभी
एक छोटा-सा सुझाव बनकर,
कभी
एक मामूली-सा रास्ता बनकर।

और जो लोग
सिर्फ़ "बड़े मौके" देखते हैं,
वे अक्सर
जिंदगी के सबसे बड़े बदलाव
गुम कर देते हैं।

अवसर
सुनहरी पंखों के साथ नहीं आता,
वो अक्सर
मिट्टी के कपड़ों में आता है।

उसके हाथों में
कोई ताज नहीं,
उसके माथे पर
कोई चमक नहीं—
बस उसकी आँखों में
एक सवाल होता है:

"क्या तुम तैयार हो? "

और सुनो…
अवसर
कमज़ोर दिलों को
सबक सिखाने आता है।

वो कहता है—
"अगर तुम डरते रहोगे,
तो मैं आगे निकल जाऊँगा।"

वो कहता है—
"अगर तुम बहाने बनाओगे,
तो मैं किसी और के हिस्से चला जाऊँगा।"

अवसर
कोई भीख नहीं है,
जो हर रोज़ मिले।

वो तो
एक उड़ता हुआ पल है—
जो अगर हाथ आ जाए
तो तक़दीर बन जाए,
और अगर निकल जाए
तो सिर्फ़
कहानी बनकर रह जाए।

जो लोग कहते हैं—
"कल कर लेंगे, "
अवसर
उनके कल में
कभी नहीं टिकता।

जो लोग कहते हैं—
"अभी नहीं, सही समय नहीं, "
अवसर
उनके लिए
कभी सही समय नहीं बनाता।

सही समय
कैलेंडर में नहीं लिखा होता,
सही समय
तुम्हारे भीतर
जागता है—

जब तुम
डर के सामने
खड़े हो जाते हो,
और अपने आप से कहते हो—
"अब होगा।"

मेरे दोस्तों,
अवसर
उनका नाम नहीं पूछता,
जो उससे मिलता है।

वो बस
हौसला देखता है,
तैयारी देखता है,
और वो आग देखता है
जो कहती है—

"मैं कर के दिखाऊँगा।"

इसलिए
जब भी
ज़िंदगी
तुम्हारे सामने
एक छोटा रास्ता खोल दे—

उसे छोटा मत समझना।

क्योंकि
छोटे रास्ते ही
कभी-कभी
बड़े मुकाम तक ले जाते हैं।

अवसर
बार-बार नहीं आता,
पर जो
पहचान लेते हैं—
उनके लिए
एक बार का अवसर
पूरी उम्र की जीत बन जाता है।

तो सुनो…
जब अवसर आए,
तो बस इतना कहना—

"हाँ… मैं तैयार हूँ।"

और फिर
पीछे मत देखना।

क्योंकि अवसर
उन्हीं को मिलता है
जो चल पड़ते हैं।

— पुष्प सिरोही

COMMENTS OF THE POEM
Nisha Sirohi 17 January 2026

👌

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