संसदों से लेकर अब तो, गाँव की चौपालों तक,
गूँज उठी है हुंकार अब, पंचायत के हालों तक।
जो खाप और पंचायतों में, चुपचाप बिठाए जाते थे,
मनुस्मृति के नियमों पर, बस फैसले थोपे जाते थे।
बदली हवा ने रुख जब, संविधान का पहरा आया,
गाँव की हर एक कुर्सी पर, हक नया सवेरा लाया।
अब सरपंच की गद्दी पर, मेहनतकश बैठा दिखता है,
अपने गाँव की तकदीर का, वह खुद ही फैसला लिखता है।
सैकड़ों सालों का खौफ अब, चौपालों में टूट रहा,
दबंगों का वह पुराना पहरा, हर कोने से छूट रहा।
शूद्र और समाज की ताकत, जब पंचायत में आती है,
गाँव-गाँव की हर एक गली में, समता लहरा जाती है!
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