शेर पर शोर की सेना का प्रहार
शेर खड़ा था चुपचाप,
सामने शोर की सेना थी,
कोई जाति के नाम पर आया,
कोई मज़हब की कहानी थी।
कहीं हॉर्न की पों-पों,
कहीं चिन-चिन का वार,
कहीं नारे ऊँचे होते,
कहीं बढ़ता था बाजार।
शेर ने पूछा—"भाइयो,
इतना शोर किसलिए?
दरवाज़े पर आहट है,
पहले देखो—कौन खड़ा है? "
शूद्र कहे—"हमारी सुनो! "
मुस्लिम बोले—"हमारी भी! "
शेर बोला—"सुनना सबको,
न्याय की राह है सबसे सही।"
सदियों की दूरी लेकर
सब अपने-अपने द्वार खड़े,
एक-दूसरे को सुनने से पहले
अपने-अपने फैसले गढ़े।
हॉर्न बजा तो सच न बदला,
नारा लगा तो न्याय न आया,
जाति-मज़हब की दीवारों ने
बस इंसान को इंसान से दूर पाया।
शेर ने फिर सिर उठाकर कहा—
"हिन्दुस्तान तभी महान होगा,
जब शोर से नहीं, संवाद से,
हर इंसान का सम्मान होगा।"
शेर पर प्रहार बहुत हुए,
पर शेर ने बदला नहीं लिया—
उसने बस संविधान उठाया
और न्याय का रास्ता चुन लिया।
सुनना है तो अपने परिवार की सुनो,
और उनकी सुनो जो सच में गुरु कहलाने के योग्य हों।
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