मैं कहता हूँ—
मेरे भीतर
एक ऐसा विस्तार है,
जहाँ आकाश भी
सीमा जैसा लगता है।
मेरे मन में
सूरज उगता है,
और उसी मन में
रात उतर आती है—
बिना किसी आवाज़ के।
मैंने देखा है
समंदर को भी
अपने भीतर समाते,
और फिर भी
मेरी सोच
प्यासा रह जाती है।
मेरे दिमाग़ की दीवारें
ईंटों की नहीं,
विचारों की बनी हैं—
और विचार
दुनिया से बड़े होते हैं।
आकाश में
बादल हैं,
मेरे भीतर
पूरे-पूरे तूफ़ान।
आकाश में
तारे हैं,
मेरे भीतर
अनगिनत सवाल।
मैं एक आदमी हूँ—
पर मेरे भीतर
सदियों का शोर है।
मेरे भीतर
माँ की दुआ है,
और पिता का आदेश।
मेरे भीतर
ग़लतियों का बोझ है,
और फिर भी
चलते रहने की ज़िद है।
मैंने जाना—
दुनिया जितनी विशाल है,
मगर मन
उससे भी बड़ा है।
क्योंकि
दुनिया सिर्फ़ रास्ते देती है,
मन
मंज़िलें बनाता है।
और सच कहूँ,
अगर मेरा मन चाहे—
तो यह आकाश भी
मेरे भीतर
छोटा पड़ जाए।
— पुष्प सिरोही
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