नज़रों की शरारत Poem by Pushp Sirohi

नज़रों की शरारत

तुम्हें पता है,
नज़रों की शरारत
कोई खेल नहीं होती—
ये तो
दो नज़रों के बीच
एक हल्की-सी बिजली होती है,
जो बिना आवाज़
सब कुछ बदल देती है।

मैंने तुम्हें
पहली बार
भीड़ में देखा था—
और भीड़
अचानक
पृष्ठभूमि बन गई।

तुम
सिर्फ़ तुम रह गईं।

और मेरे भीतर
एक शरारती-सा ख्याल उठा—
कि अगर मैं
बस एक पल
तुम्हारी तरफ देख लूँ,
तो क्या तुम
देखकर मुस्कुराओगी?

फिर तुमने देखा।

और उस पल
मेरी सारी समझदारी
जैसे जेब से गिर गई।

क्योंकि तुम्हारी आँखों में
कुछ ऐसा था—
न पूरा "हाँ",
न पूरा "ना",
बस एक अधूरा-सा वादा था,
जो कह रहा था—
"आगे बढ़ो…
अगर हिम्मत है।"

मैं तुम्हारी तरफ
एक कदम बढ़ा,
और दुनिया
दो कदम पीछे हट गई।

तुमने
अपने होंठ दबाए—
वो छोटी-सी हरकत
इतनी बड़ी थी
कि मेरे दिल ने
सारे नियम
तोड़ दिए।

नज़रों की शरारत
ऐसी ही होती है—
एक पल का जादू,
जो सीधा
रूह पर लगता है।

ना उसमें
किसी रिश्ते का नाम होता है,
ना कोई
भविष्य की शर्त होती है,
बस
वर्तमान का नशा होता है।

मैंने कहा नहीं कुछ,
तुमने सुना भी नहीं—
फिर भी
हम दोनों
बहुत कुछ समझ गए।

हवा ने
हमारे बीच
एक लकीर खींच दी,
और उसी लकीर पर
हमारा "शायद"
नाचने लगा।

तुमने
बालों को कान के पीछे किया,
और मुझे लगा
जैसे
किसी ने
मेरी धड़कन को
छू लिया हो।

तुम चलीं,
पर तुम्हारा जाना
जाना नहीं था—
वो तो
मेरे भीतर
रुक जाना था।

मैंने तुम्हें
फिर पलटकर देखा,
और तुमने भी।

बस उतना ही।

और वही
सबसे बड़ा इशारा था—
कि कहानी
अब भी अधूरी है।

नज़रों की शरारत
कभी
तुम्हारी हँसी में होती है,
कभी
तुम्हारी चुप्पी में होती है।

कभी
ये सिर्फ़ एक पल होती है,
और कभी
पूरी उम्र की
चिंगारी बन जाती है।

और सच कहूँ—
तुम्हारे साथ
नज़रों की शरारत
मुझे बेहतर इंसान नहीं बनाती…

मुझे
जिंदा बना देती है।

क्योंकि जब तुम
नज़रें मिलाती हो,
तो मेरा दिल
अपनी ही धड़कन को
फिर से पहचान लेता है।

तो हाँ…
अगर ये शरारत है,
तो मैं
बार-बार
गुनाह करना चाहता हूँ।

बस शर्त इतनी है—
तुम
एक बार फिर
वही अधूरा-सा "हाँ"
अपनी आँखों में रख देना…

और मैं
हर बार
वही बहाना बन जाऊँगा
जिससे
तुम मुस्कुरा दोगी।


------पुष्प सिरोही

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