रसोई में प्रेम Poem by Pushp Sirohi

रसोई में प्रेम

सुबह की पहली रोशनी
खिड़की की सलाखों से
चुपचाप अंदर आई,
और रसोई की दीवार पर
एक सुनहरी रेखा छोड़ गई।

तुमने
चाय के कप को
दो बार घुमाया—
जैसे जीवन को
फिर से सही दिशा में
रख रही हो।

मैं देखता रहा
तुम्हारे हाथों की
सादगी,
उसमें कोई प्रदर्शन नहीं,
बस एक आदत थी—
प्यार को रोज़ निभाने की।

तुमने नमक उठाया,
और थोड़ा-सा
दाल में गिराया—
उस एक चुटकी में
मुझे लगा
घर बसता है।

बाहर सड़क पर
लोग अपने-अपने युद्ध
लिए चलते थे—
कोई पैसे का,
कोई प्रतिष्ठा का,
कोई अकेलेपन का।

और भीतर
तुम्हारी चूड़ियों की
हल्की-सी आवाज़
इतनी पर्याप्त थी
कि दुनिया का शोर
छोटा लगने लगा।

मैंने सोचा—
इतिहास किताबों में नहीं,
ऐसे ही
किचन की गर्मी में
रचा जाता है…

जहाँ स्त्रियाँ
अपने धैर्य से
दिन बनाती हैं,
और पुरुष
उनके बनाए दिन में
जीना सीखते हैं।

तुमने
मेरी तरफ देखा,
कुछ कहा नहीं—
बस मुस्कुरा दीं।

वो मुस्कान
ऐसी थी
जैसे किसी पुराने दुख पर
नई चादर डाल दी गई हो।

और मैं समझ गया:
प्रेम
कविता का विषय नहीं,
प्रेम तो
जीवन की रोटी है—
जो हर दिन
दोनों हाथों से
तोड़ी जाती है।

— पुष्प सिरोही

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