खेतों की माटी से उठकर, जब चौपालों तक बात चली,
संविधान के इस धागे से, नई व्यवस्था की रात ढली।
यह कोई अकेला स्वर नहीं, अनुशासन का भारी दौर है,
सुन लो बहरी सत्ता वालो—यह संघात्मक शोर है!
ट्रैक्टर की गूँज सड़क पर है, पुलिस-फौज का पहरा है,
हर कोने में मेहनतकत का, अब जगमगाया चेहरा है।
गाँव की उस पंचायत से ले, दिल्ली के दरबारों तक,
न्याय और अधिकारों की लड़ाई पहुँची है गलियारों तक।
गलियों की पहरेदारी हो, या कोडिंग का डिजिटल जोर,
IBM, Google की दुनिया से, खेत और खलिहान की ओर।
हर इकाई, हर तबका जब एक संग आकर जुड़ता है,
तब जाकर यह संघात्मक चक्र पूरी ताकत से मुड़ता है!
नीतियों के हर पन्ने पर, अब अपना हक लिखा जाएगा,
अन्याय का यह अंधेरा, जड़ से उखड़ के जाएगा।
जब शोषित और मेहनतकश का यह कारवाँ जोर करेगा,
तब यह संघात्मक शोर पूरे देश का नक्शा बदलेगा!
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