गरीब मिस्त्री और उसका भूखा परिवार Poem by Pushp Sirohi

गरीब मिस्त्री और उसका भूखा परिवार

सुबह सवेरे निकला मिस्त्री,
कंधे पर औज़ार लिए।
रोटी की उम्मीद जगाए,
सपनों को साथ लिए।

दिनभर ईंटें जोड़ता रहता,
दूसरों के घर बनाता।
शाम ढले जब घर को लौटे,
अपना चूल्हा ठंडा पाता।

बच्चा बोला, 'बाबा, भूख लगी है,
आज क्या खाने को लाए? '
मिस्त्री ने मुस्कान छुपाई,
आँसू मन ही मन पी जाए।

पत्नी चुपचाप दिल समझाए,
'कल शायद कुछ काम मिलेगा।'
उम्मीदों के छोटे दीपक से,
फिर जीवन उजियारा होगा।

जिसने महलों को खड़ा किया,
उसका घर क्यों वीरान रहे?
मेहनतकश का मान बढ़े,
कोई परिवार भूखा न रहे।

Sunday, July 26, 2026
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