डमरू से हॉर्न तक — एक ऐतिहासिक प्रथा का शोर Poem by Pushp Sirohi

डमरू से हॉर्न तक — एक ऐतिहासिक प्रथा का शोर

कभी इतिहास ने सिखाया था,
दरवाज़े पर आहट से पहले
अपनी मौजूदगी बताना,
कभी डमरू, कभी लकड़ी की थाप से
दूरी का संदेश सुनाना।
शूद्र-वर्ण की ऐतिहासिक स्थिति के संदर्भ में
इन सामाजिक प्रथाओं को पढ़ना होगा—
क्योंकि हर आवाज़ के पीछे
एक पूरा सामाजिक इतिहास था।
वक्त बदला,
संविधान आया,
बराबरी का अधिकार आया—
लेकिन कुछ पुरानी आदतों ने
बस अपना साधन बदल लिया।
डमरू गया,
डंडी गई,
अब हॉर्न आ गया! 😄
पर सवाल आज यह नहीं—
कौन जाति का है?
सवाल यह है—
कौन शोर कर रहा है,
और किसकी शांति छीन रहा है?
दरवाज़े के बाहर लगातार शोर क्यों हो?
किसी की पूजा हो सकती है,
किसी का बच्चा सो रहा हो,
किसी का बुज़ुर्ग आराम कर रहा हो—
सड़क सबकी है,
शांति भी सबकी है।
इतिहास को दोहराना नहीं,
इतिहास से आगे बढ़ना है।
न पहचान बताने को शोर चाहिए,
न दूरी बनाने को आवाज़।
आज का भारत कहता है—
सम्मान से दस्तक दो,
और ज़रूरत हो तभी हॉर्न बजाओ।
डमरू से हॉर्न तक की यात्रा
अब शांति पर समाप्त हो—
पुरानी सामाजिक दूरियाँ मिटें,
नई नागरिक संवेदना जुड़े। 🇮🇳⚖️
इतिहास पढ़ें।
भेदभाव समझें।
शोर घटाएँ।
समानता बढ़ाएँ।

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