रूह की भी भूख Poem by Pushp Sirohi

रूह की भी भूख

वह आई—
जैसे रात की पलकों पर
काजल बनकर उतरती कोई आग,
जैसे इत्र में भीगी हुई
कोई निषिद्ध सांस।

उसकी आँखें—
दो शरारती मोमबत्तियाँ,
जो रोशनी नहीं,
मेरे भीतर का संयम
पिघलाती थीं।

मैंने उसे चाहा
जैसे प्यास चांदनी को चाहती है—
पर चांदनी
प्यास नहीं बुझाती,
बस उसे और खूबसूरत
कर देती है।

उसके होंठों का जादू
किसी धर्मग्रंथ का मंत्र नहीं था,
वह तो
एक ऐसा शाप था
जो मीठा लगता है
और फिर भी—
मोक्ष नहीं देता।

हर छुअन में
एक वादा था—
और हर वादे के भीतर
एक धोखा छिपा था,
फिर भी
मैं उसी धोखे को
सच समझकर
पूजा करता रहा।

उसकी हँसी—
किसी गिरजे में
गिरी हुई घंटी जैसी थी,
मैं हर बार कांपता
और हर बार
और पास चला जाता।

क्योंकि वासना—
शरीर की नहीं,
रूह की भी भूख होती है;
वह कहती है—
"तुम मुझे पा लो"
और फिर
तुम्हें तुम्हारा ही
क़ातिल बना देती है।

मैंने उसे छोड़ा नहीं,
मैं बस
धीरे-धीरे
अपने आप से
छूटता गया।

और जब सुबह आई—
मेरे होंठों पर
उसका स्वाद नहीं,
उसकी याद थी—
एक काली गुलाब-सी याद
जो जितना चूमो
उतनी ही
कांटेदार हो जाती है।

— पुष्प सिरोही

रूह की भी भूख
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