खो देना—
एक कला है।
और सच कहूँ तो
इस कला में
दुनिया के ज़्यादातर लोग
अनजाने में माहिर हो जाते हैं।
पहले-पहले
हम छोटी चीज़ें खोते हैं—
चाबियाँ,
कागज़ पर लिखे नंबर,
रास्तों के नाम,
किसी शाम की हल्की-सी मुस्कान।
और हम खुद को समझाते हैं—
"कोई बात नहीं…"
खोना तो
सामान्य है।
फिर
हम थोड़ा बड़ा खोते हैं—
समय।
कितना समय
जो हमने
अपने लिए रखा था,
लेकिन दूसरों के लिए
खर्च कर दिया।
कितना समय
जो तुम्हारे साथ
रह सकता था,
लेकिन
रुक नहीं पाया।
और मैं फिर कहता हूँ—
"कोई बात नहीं…"
समय खोना भी
तो
एक आदत है।
फिर
हम रिश्ते खोते हैं।
किसी का "अच्छा रहना",
किसी का "ध्यान रखना",
किसी का "समझना"—
धीरे-धीरे
एक दूसरे से
गिरते चले जाते हैं
जैसे जेब में रखे
पुराने सिक्के।
और हम कहते हैं—
"सब ठीक है…"
क्योंकि
किसी को भी
हमेशा नहीं रखा जा सकता।
पर तुम…
तुम्हें खोना
पहले जैसा नहीं था।
तुम कोई चाबी नहीं थीं
जो किसी दराज़ में
गुम हो जाए,
तुम कोई समय नहीं थीं
जो घड़ी में
खत्म हो जाए।
तुम
मेरे भीतर का वो हिस्सा थीं
जो मुझे
मैं बनाता था।
और तुम्हें खोकर
मैंने
खुद को भी
कम पाया।
मैं कोशिश करता रहा
इसे भी
सामान्य बनाकर कह दूँ—
"कोई बात नहीं…"
मैंने खुद को
सिखाना चाहा
कि दर्द को भी
फॉर्मल भाषा में
तोलकर रख दूँ।
पर सच बताऊँ—
इस बार
"कोई बात नहीं"
कहना
सबसे मुश्किल था।
मैंने खोया
कुछ शहर,
कुछ रास्ते,
कुछ गाने,
कुछ खिड़कियाँ
जो तुम्हारी याद से
खुलती थीं।
मैंने खोई
वो जगह
जहाँ तुम बैठती थीं,
वो कप
जिसमें तुम चाय पीती थीं,
वो सुबह
जिसमें तुम
मेरे नाम से जगाती थीं।
और हर बार
मैं खुद से कहता रहा—
"खो देना तो
एक कला है…"
लेकिन तुम्हें खोना—
ये कला नहीं थी।
ये तो
मेरे भीतर का
एक मंदिर टूटना था।
ये तो
मेरी सांसों का
एक हिस्सा रुकना था।
फिर भी मैं
खुद को
समझाता हूँ—
संभालता हूँ—
जैसे कोई आदमी
टूटे हुए शीशे पर
धीरे-धीरे
चलना सीखता है।
और अब
जब भी तुम
कहीं दूर से
याद बनकर आती हो,
मैं फिर
कला की भाषा में
खुद को बचाता हूँ—
"हाँ…
खो देना
एक कला है…"
लेकिन इस बार
मेरी आवाज़
हल्की काँप जाती है,
और मेरे शब्दों के पीछे
एक सच्चाई
छुप जाती है—
कि
तुम्हें खोना
किसी कला जैसा नहीं था।
(यह कहना—
तुम्हें खोना—
यह कहना…
आसान नहीं है…
बिल्कुल भी नहीं।)
— पुष्प सिरोही
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