मस्तक कट सकता है,
पर झुक नहीं सकता।
यह अधिवक्ता का शीश है—
जिस पर न्याय का तेज है,
जिसमें संविधान की शपथ है,
और जिसकी नसों में
सत्य का संकल्प बहता है।
यह मस्तक
अन्याय के सम्मुख नहीं झुकेगा,
भय के आगे नहीं झुकेगा,
सत्ता के दबाव में नहीं झुकेगा।
यह झुकेगा तो केवल न्याय के चरणों में,
वरना टूट जाएगा—
पर झुकेगा नहीं।
इसके उठते ही
सिंहासन काँपेंगे,
राजदंड थर्राएँगे,
अहंकार के दुर्ग ढहेंगे।
यह स्वर
केवल स्वर नहीं—
विधि की हुंकार है।
यह कलम
केवल कलम नहीं—
अन्याय के वक्ष पर चलती हुई
न्याय की रेखा है।
हमारी दलील
जब न्यायालय में गूँजेगी,
तो शब्द नहीं—
सिद्धांत गर्जेंगे।
हमारी शपथ
जब अधरों से निकलेगी,
तो मौन दीवारें भी
न्याय का घोष सुनेंगी।
रास्ते में तूफ़ान हों—
हम बढ़ेंगे।
आकाश में बिजली हो—
हम खड़े रहेंगे।
समय परीक्षा ले—
हम सहेंगे।
पर—
मस्तक कट सकता है,
मस्तक झुक नहीं सकता।
क्योंकि यह शीश
किसी सिंहासन का दास नहीं,
न्याय का प्रहरी है।
और जब न्याय के प्रहरी
अपने मस्तक को ऊँचा रखते हैं—
सिंहासन काँपते हैं,
अन्याय काँपता है,
अहंकार काँपता है—
और इतिहास
नया अध्याय लिखता है।
यह मस्तक झुक नहीं सकता।
यह मस्तक बिक नहीं सकता।
यह मस्तक डर नहीं सकता।
कट जाएगा—
पर झुकेगा नहीं।
टूट जाएगा—
पर सत्य से हटेगा नहीं।
क्योंकि यह
अधिवक्ता का शीश है—
और इसके भीतर
न्याय की अग्नि जलती है।
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