चुंबन Poem by Pushp Sirohi

चुंबन

तुम्हारा चुंबन—
कोई स्पर्श नहीं था,
वो तो मेरे भीतर
एक नई दुनिया का
पहला उजाला था।

उस पल
मेरे सारे शब्द
मौन में बदल गए—
और दिल ने
सीधा प्रार्थना करना सीख लिया।

मैंने तुम्हें
भीड़ में देखा था,
पर तुम्हारे चुंबन के बाद
मैंने तुम्हें
अपने भाग्य में पाया।

तुम्हारे होंठों की गर्माहट
मेरे माथे पर
ऐसे उतर गई—
जैसे सर्द रात में
अचानक
दीपक जल उठे।

मैंने बहुत कुछ चाहा था,
नाम बदले थे इच्छाओं के—
पर उस एक चुंबन ने
मुझे समझा दिया
कि प्रेम
कुछ पाने का नहीं,
किसी में
खो जाने का नाम है।

जब तुम पास आईं—
समय
अपने पाँव खींचकर
धीमा चलने लगा।

और मेरी साँसों ने
तुम्हारे नाम का
एक ही मंत्र जपा—
"रुको… अभी मत जाओ।"

उस चुंबन में
तुम्हारी पूरी निष्ठा थी,
और मेरी
पूरी गहराई भी।

उस चुंबन में
तुम मेरी नहीं बनीं—
मैं तुम्हारा हो गया।

अब दुनिया कहे
जो भी कहे,
मेरे लिए
सबसे बड़ा सत्य यही है—
मैंने जीवन में
कभी ईश्वर नहीं देखा,
पर तुम्हारे चुंबन में
उसका स्पर्श
ज़रूर पाया है।

— पुष्प सिरोही

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