नाम जो रास्ते से मिला Poem by Pushp Sirohi

नाम जो रास्ते से मिला

मैं किसी मंच से नहीं आया,
मेरी शुरुआत
स्कूल की उस प्रार्थना-सभा से हुई
जहाँ धूप सीधी खड़ी रहती थी
और बच्चे
अपने बस्तों से ज़्यादा
अनुशासन उठाए चलते थे।

केंद्रीय विद्यालय—
जहाँ नाम से पहले
पोस्टिंग बोली जाती थी,
जहाँ पिता की वर्दी
बच्चों की रीढ़ में
सीधापन छोड़ जाती थी।

मैं उन्हीं बच्चों के बीच था।
सेना के घरों से आए बच्चे—
कम बोलने वाले,
समय पर पहुँचने वाले,
और हार को
बहाना नहीं बनाने वाले।

दोपहर बाद
मैदान खुलता था।
मिट्टी, पसीना,
और कबड्डी की साँसें।
वहाँ जीत से पहले
सम्मान सीखा जाता था।

हम एक-दूसरे को
नाम से नहीं पुकारते थे।
कभी "कप्तान",
कभी "सीनियर",
और कई बार
बस एक शब्द—
"ब्रिगेडियर।"

वो शब्द
मज़ाक नहीं था,
वो भरोसे का छोटा सा कंधा था—
जिस पर टीम टिक जाती थी।

समय बीतता गया।
स्कूल छूट गया,
मैदान बदल गए,
पर वो शब्द
मेरे भीतर चलता रहा।

जब कविता मेरे पास आई
और बोली—
"नाम चुनो, "
मैंने ताज नहीं चुना,
मैंने
अपनी ज़मीन चुनी।

क्योंकि "ब्रिगेडियर"
मेरे लिए पद नहीं था,
वो याद था—
सीधे खड़े रहने की,
बिना शोर के आगे बढ़ने की,
और
जिम्मेदारी को
पहचान बनाने देने की।

आज भी
जब मैं लिखता हूँ,
तो शब्द
तालियाँ नहीं ढूँढते।
वे
ठहराव ढूँढते हैं।

भीड़ हो
या सुनसान कमरा—
मैं वही रहता हूँ
जो तब था।

सादे कपड़ों में,
अनुशासित मन के साथ,
उस यात्रा से प्रेम करते हुए
जो मुझे
हर दिन
सफल होने के क़ाबिल बनाती है।

और इसलिए
कविता के नीचे
मैं अपना नाम ऐसे लिखता हूँ—

(ब्रिगेडियर) पुष्प सिरोही

क्योंकि कुछ नाम
खुद नहीं चुने जाते,
वे
ज़िंदगी सिखा देती है।

— (ब्रिगेडियर) पुष्प सिरोही

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success