कई युग गुज़रे,
कई तूफान आए—
पर भारत की मिट्टी ने
हर बार अपने सपने बचाए।
ये कहानी सिर्फ़ राजाओं की नहीं,
ये कहानी सिर्फ़ युद्धों की नहीं—
ये कहानी है उस आत्मा की
जो टूटकर भी कभी झुकी नहीं।
कभी वेदों की ध्वनि थी,
कभी ऋषियों का ज्ञान,
कभी गुरुकुल की रोशनी
और सत्य का सम्मान।
जहाँ शब्द नहीं—
संस्कार बनते थे,
जहाँ जीवन के अर्थ
ध्यान में ढलते थे।
भारत तब भी भारत था,
जब दुनिया अंधकार में थी,
जब मानवता की पहली राह
यहीं कहीं तैयार में थी।
फिर समय बदला,
और आँधी आई—
कभी आक्रमणों की,
कभी बेड़ियों की परछाईं।
पर भारत ने
सिर्फ़ सहा नहीं,
भारत ने
सीखा भी…
और हर वार के आगे
अपनी जड़ों को और
गहरा किया।
जब गुलामी ने
हमारे हाथ बाँधे,
भारत ने
अपने सपनों से
हथकड़ियाँ तोड़ीं।
किसानों की हथेली ने
धरती का माथा ऊँचा रखा,
मज़दूरों के पसीने ने
देश का भाग्य लिखा।
माँओं ने
आँचल में क्रांति छुपाई,
और बेटों ने
सीने पर गोलियाँ खाई।
यहाँ भगत सिंह
हँसकर फाँसी चढ़ा,
यहाँ आज़ाद ने
वचन को गोली की तरह निभाया।
यहाँ लक्ष्मीबाई
तलवार बनकर गरजी,
और तिलक की आवाज़
हर गली में बरसी।
यहाँ गांधी के सत्य ने
साम्राज्य की दीवारें हिला दीं,
यहाँ सुभाष की आग ने
गुलामी की रातें जला दीं।
और फिर…
एक दिन ऐसा भी आया
जब तिरंगा आसमान में
अपना हक़ माँगने नहीं—
अपना स्थान लेने लहराया।
आज़ादी सिर्फ़ तारीख़ नहीं थी,
आज़ादी एक प्रार्थना थी,
जिसे शहीदों के खून ने
धरती में सींचा था।
मगर पहचान की कहानी
यहीं खत्म नहीं होती—
भारत सिर्फ़ जीतकर नहीं,
बनकर भी दिखाता है।
कभी हम विज्ञान बनते हैं,
कभी हम योग बनते हैं,
कभी हम सेवा बनते हैं,
और कभी हम
विश्वास का उजाला बनते हैं।
हमारी पहचान है—
विविधता का उत्सव,
हमारी पहचान है—
सहिष्णुता का अर्थ,
हमारी पहचान है—
संस्कार, संस्कृति,
और संघर्ष का सामर्थ्य।
भारत की पहचान
कागज़ पर नहीं लिखी गई,
ये पहचान
हजारों बलिदानों से गढ़ी गई।
ये पहचान है
उस किसान की,
जो धूप में जलकर
अन्न बनाता है।
ये पहचान है
उस सैनिक की,
जो नींद छोड़कर
देश बचाता है।
तो सुनो—
ये भारत की कहानी है,
जो हर युग में
नई पहचान बनाती है।
हमारे भीतर
भारत सिर्फ़ रहता नहीं—
भारत धड़कता है,
भारत चलता है,
भारत कर्म बनकर
दुनिया में चमकता है।
और यही तो है—
भारत के अपनी पहचान बनाने की कहानी,
जो कल भी अमर थी,
आज भी अमर है,
और कल भी
दुनिया को रोशनी देगी…
हिंदुस्तान की ज़ुबानी। 🇮🇳🔥-पुष्प सिरोही
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