तुम्हारे होंठों की प्यास Poem by Pushp Sirohi

तुम्हारे होंठों की प्यास

मुझे तुम्हारा मुँह चाहिए—
जैसे सूखे होंठों को
बरसात की पहली बूंद चाहिए,
जैसे रात को चाँद की
एक सफ़ेद सुई चाहिए।

मुझे तुम्हारी साँस चाहिए—
जो मेरे भीतर उतरकर
मेरे नाम को नया अर्थ दे,
और मेरे सीने में
एक जंगली गीत जगा दे।

तुम्हारे होंठ—
मेरी रूह पर रखा हुआ
सबसे नरम हथियार हैं,
जो मुस्कुराकर भी
मुझे घायल कर देते हैं।

मैं तुम्हें छूना नहीं—
तुममें खो जाना चाहता हूँ,
अपने पूरे होने की
आख़िरी दलील
तुम्हारे करीब चाहता हूँ।

तुम जब पास आती हो—
मेरे भीतर के सारे शब्द
सिर्फ़ "तुम" बन जाते हैं,
मेरे सारे ख्वाब
तुम्हारी पलकों में
घर बनाने लगते हैं।

और मैं—
हर बार तुम्हें देखकर
भूखा हो जाता हूँ,
एक ऐसी भूख
जो सिर्फ़ प्यार से नहीं,
तुम्हारी मौजूदगी से
जीती है।

तुम्हारे होंठों का स्वाद—
मेरे भाग्य की स्याही है,
मैं हर रात
उसी से लिखता हूँ
अपनी प्रेम-प्रार्थना।

तुम्हारी देह नहीं—
मुझे तुम्हारा जादू चाहिए,
वो जादू
जो मेरी दुनिया को
एक ही चुंबन में
रोशन कर दे।

मैं तुम्हारी प्यास हूँ—
और तुम…
मेरी प्यास का
एकमात्र जवाब।

— पुष्प सिरोही

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success