मेरे शब्दों को
तुमने चरित्र का तराज़ू बना दिया—
कविता पढ़कर
मुझे नापने लगे,
जैसे नैतिकता की दुकान
तुम्हारे घर की जागीर हो।
अरे साहब,
कविता जीवन है—
वह कभी फूल बनती है,
कभी काँटा,
कभी चूमती है,
कभी काटती है।
तुम कहते हो—
'इतनी आग क्यों? '
मैं कहता हूँ—
क्योंकि झूठ ठंडा होता है,
और सच को
ताप चाहिए।
तुम्हें मेरे शब्द
गंदे लगते हैं?
तो कान धो लो—
पर मेरी ज़ुबान को
साबुन मत सिखाओ।
मैं प्रेम लिखूँ
तो तुम कहते हो
'कमज़ोर हो।'
मैं दहाड़ लिखूँ
तो तुम कहते हो
'असभ्य हो।'
तुम्हारी समस्या
मेरी कविता नहीं—
तुम्हारा डर है:
कि एक इंसान
बिना तुम्हारी इजाज़त के भी
खुलकर बोल सकता है।
मैं कवि हूँ—
न नियमों का नौकर,
न तुम्हारे ‘सभ्य' प्रमाणपत्र का गुलाम।
मेरे शब्द
तुम्हारे नकाब
नोचेंगे—
और अगर तुम्हें दर्द होगा,
तो समझ लेना:
ज़ख्म तुम्हारे भीतर था,
मैंने बस
हवा लगा दी।
तो सुनो—
मैं वही लिखूँगा
जो मेरी रगों में
जगमगाता है,
और जो तुम
छुपाते हो।
क्योंकि
कविता का काम
लोरियाँ देना नहीं,
कभी-कभी
नींद तोड़ना भी है।
जय हिंद
— पुष्प सिरोही
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