दुनिया के नाम Poem by Pushp Sirohi

दुनिया के नाम

मुझे सफल होने की मंज़िल से नहीं,
सफल बनने की यात्रा से प्रेम है।

उस शोर से नहीं
जो अंत में उठता है,
मुझे उस ख़ामोशी से लगाव है
जो मुझे
अकेले चलना सिखाती है।

दुनिया—
मैं जल्दबाज़ी में नहीं पहुँचा,
मैंने खाली रास्तों से
सब्र सीखा है,
और उन दिनों से ताक़त
जब कोई देख नहीं रहा था।

मैंने लंबा रास्ता चुना—
जहाँ सुबहें
अनुशासन माँगती हैं,
रातें
हौसले की परीक्षा लेती हैं,
और प्रगति
बिना तालियों के
आती है।

मेरे लिए सफलता
रफ़्तार नहीं—
स्थिरता है।
सीधे खड़े रहने की क्षमता,
जब सुविधा
झुकने को कहे।

मैंने सपनों से पहले
अपने मन को प्रशिक्षित किया,
क्योंकि व्यवस्था के बिना
महत्त्वाकांक्षा
सिर्फ़ भ्रम होती है।

मैं इस यात्रा का सम्मान करता हूँ,
क्योंकि यही
मुझे सुधारती है,
बहाने छीन लेती है,
और इच्छा की जगह
ज़िम्मेदारी रख देती है।

दुनिया—
मुझे देरी से डर नहीं,
हर क़दम
मेरी पकड़ मजबूत करता है,
हर ठोकर
मेरी दृष्टि तेज़ करती है,
हर निशान
मेरी बढ़त याद रखता है।

मैं चुपचाप चलता हूँ,
पर तैयार चलता हूँ।
न स्वीकृति के पीछे,
न उधार के जोश पर—
बस
स्थायित्व बनाता हुआ।

जिस दिन तुम इसे
सफलता कहोगे,
मैं उसे
कर्तव्य पूर्ण कहूँगा।

क्योंकि
मुझे मंज़िल से प्रेम नहीं था—

मुझे उसके योग्य बनने से प्रेम था।

— (ब्रिगेडियर) पुष्प सिरोही

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