मृत्यु ही मर जाएगी Poem by Pushp Sirohi

मृत्यु ही मर जाएगी

मृत्यु—
तू अभिमानी मत बन।
तू अपने आपको
बहुत ताक़तवर समझती है,
पर सच यह है—
तू ताक़त नहीं,
बस
एक क्षण की सीमा है।

तू कहती है—
"मैं समाप्ति हूँ।"
पर तू नहीं जानती,
तू समाप्ति नहीं,
तू तो
एक दरवाज़ा है।

कई लोग
तुझसे डरते हैं,
कई लोग
तेरे नाम पर काँपते हैं।
पर मैं तुझे कहता हूँ—
मृत्यु,
तू कोई राजा नहीं।

तू बस
थकी हुई सांसों को
एक पल का विश्राम देती है।
तू बस
आँखों से
नींद की चादर खींच देती है।

और जिनको तू
अपना शिकार समझती है,
वो सच में
तुझसे हारते नहीं—
वो
तुझसे आगे निकल जाते हैं।

क्योंकि
जिसके भीतर
आत्मा जागती है,
उसके लिए
तू अंत नहीं।

तू तो
नींद की तरह है—
कुछ क्षण की।
और नींद के बाद
सुबह आती है।

तो फिर
तू इतनी घमंडी क्यों?

तू दवा की तरह भी तो है—
जिससे
दर्द शांत होता है।
तू राहत है,
तू विश्राम है।

तू कहती है
"मैं डर हूँ।"
पर तू डर नहीं—
तू तो
मुक्ति की छाया है।

और सुन, मृत्यु—
तू खुद
किसके सहारे जीती है?

ज़हर,
बीमारी,
दुर्घटना,
हिंसा—
ये सब
तेरे साथी हैं।

तू अकेले
कुछ भी नहीं।

मगर इंसान—
इंसान अकेला भी
तुझसे बड़ा है।

क्योंकि
वो हँसता है,
वो रोता है,
वो प्रेम करता है—
और अपने प्रेम के कारण
अमर हो जाता है।

तू बस
शरीर को छूती है।
आत्मा तक
तेरी पहुँच नहीं।

आत्मा
समय से परे है।
और प्रेम—
प्रेम तो
मृत्यु से भी परे है।

इसलिए, मृत्यु—
तू अभिमानी मत बन।
तू कहती है
"मैं सबको हरा दूँगी।"

पर सच सुन—
एक दिन
तू भी हार जाएगी।

क्योंकि
जिस दिन
अंतिम भय मिट जाएगा,
जिस दिन
आत्मा जाग जाएगी—
उस दिन

मृत्यु ही मर जाएगी।

— पुष्प सिरोही

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