अब—यहीं से दहाड़ो! Poem by Pushp Sirohi

अब—यहीं से दहाड़ो!

मत पूछो—
"कब हालात बदलेंगे? "
तुम दहाड़ो!
और हालात
थरथराएँ।

मत कहो—
"मेरे पास क्या है? "
तुम्हारे पास
लहू है,
लौ है,
और एक ज़िद है—
बस वही काफी है!

जो हाथ खाली हैं,
वो हाथ भी
इतिहास लिखते हैं—
अगर मुट्ठी में
हौसला भर जाए।

शुरुआत
कभी ताली से नहीं होती,
शुरुआत
कभी-कभी
अपमान से होती है—
और वही अपमान
तुम्हें
अग्नि बना देता है।

आज तुम्हारे पास
बहाने होंगे,
पर सुनो—
बहाने
कमज़ोरों की भाषा है।

तुम्हारे भीतर
जो आग है,
उसे मत दबाओ।
वो आग
रास्ता नहीं ढूँढती—
वो रास्ता
जला कर बनाती है!

खड़े रहना
किसी का सम्मान नहीं,
खड़े रहना
कायरता का नाम है—
चलो!
और दुनिया को बता दो
कि तुम रुके नहीं।

पहला कदम
छोटा लगेगा,
पर वही कदम
सम्राटों की नींव हिलाता है।

जो आज "असंभव" है,
उसे "संभव" बनाना
तुम्हारा काम है।

और याद रखो—
जीत
पहले हाथ में नहीं आती,
जीत
पहले
आँखों में आती है!

तो अब
इंतज़ार खत्म—
डर खत्म—
बहाना खत्म—

अब—यहीं से दहाड़ो!

— पुष्प सिरोही

अब—यहीं से दहाड़ो!
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