झुकना हमें आता नहीं Poem by Pushp Sirohi

झुकना हमें आता नहीं

और अगर मसला
मेरे झुकने से ख़त्म होगा—
तो बेफ़िक्र रहो,
यह मसला उम्रभर चलेगा।

क्योंकि गर्दन हमारी
सिर्फ़ न्याय के सामने झुकती है,
सत्ता के सामने नहीं,
भय के सामने नहीं,
और किसी अन्यायपूर्ण आदेश के सामने नहीं।

हम ख़ामोश हैं
तो इसे कमज़ोरी मत समझना—
हमारी ख़ामोशी के पीछे
विधि की पूरी किताब खड़ी है।

हम शब्दों से नहीं डरते,
हम धाराओं से लड़ते हैं;
हम धमकियों से नहीं रुकते,
हम तर्कों से इतिहास बदलते हैं।

जिसे तुम ज़िद कहते हो,
वह हमारे लिए सिद्धांत है;
जिसे तुम अहंकार कहते हो,
वह अन्याय के सामने
'अडिग स्वाभिमान' है।

हम समझौता कर लें—
तो शायद आज मसला ख़त्म हो जाए;
पर याद रखना—

'झुक गया अगर न्याय के प्रहरी का मस्तक,
तो कल अन्याय का साम्राज्य खड़ा होगा।'

इसलिए रास्ता लंबा हो तो होने दो,
मुक़दमा कठिन हो तो होने दो,
सदियाँ लगें तो लगने दो—

हम तारीख़ों से नहीं डरते,
हम सत्य के दस्तावेज़ लिखते हैं।

क्योंकि—

हम विधिशास्त्र के ज्ञाता हैं,
अन्याय के दर्शक नहीं।

और जब सिद्धांत पर आ जाए बात,
तो फिर फैसला समय नहीं करता—

इतिहास करता है।

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