मैंने प्रेम जाना ही नहीं Poem by Pushp Sirohi

मैंने प्रेम जाना ही नहीं

सच्चा प्रेम वह नहीं जो मौसम-सा बदल जाए,
जो आज पास हो—और कल हवाओं में बिखर जाए।
वह तो दीप है, जो आँधियों में भी जले,
जो तम की छाती चीर—अपनी लौ से राह लिखे।

न दूरी उससे कुछ छीनती, न समय उसे हराए,
न आँखों की तृष्णा उसे साधारण कह पाए।
वह पत्थर-सा स्थिर है, समंदर-सा गहरा,
हर लहर के प्रहार में और भी निखरा।

रूप ढल जाए, हँसी मिट जाए, देह थक जाए,
पर आत्मा का यह वचन कभी झूठा न कहलाए।
प्रेम घंटे की सूई नहीं, जो पल में दिशा खो दे,
प्रेम वह ध्रुव-तारा है—जो रातों को सच दे।

और यदि यह असत्य हो—तो मेरा अस्तित्व व्यर्थ,
मैंने प्रेम जाना ही नहीं, लिखा ही नहीं कोई अर्थ।

— पुष्प सिरोही

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