हमारे बीच की खामोशी Poem by Pushp Sirohi

हमारे बीच की खामोशी

आज रात
शब्दों ने
अपने कपड़े उतार दिए हैं—
और मैं
तुमसे कुछ ऐसा कहने आया हूँ
जो भाषण नहीं…
बस सच है।

तुम्हारे पास
मैं किसी नायक की तरह नहीं आता,
मैं किसी विजेता की तरह नहीं आता—
मैं तो बस
अपने भीतर का आदमी लेकर आता हूँ,
जिसे तुमने
पहली बार
शांत करना सिखाया।

तुम्हारा होना
मेरे लिए
किसी गर्म रोशनी जैसा है—
जो कमरे में नहीं,
सीधे मेरे भीतर उतरती है।

और ये रात…
ये रात
किसी नियम में नहीं बंधती,
यहाँ कोई "सही-गलत" नहीं,
यहाँ सिर्फ
हमारा वर्तमान है—
धीमा,
गहरा,
और असली।

तुम्हारे बाल
मेरी हथेलियों में
लहरों की तरह आते हैं,
और मैं
हर लहर से
थोड़ा-थोड़ा
अपना डर उतार देता हूँ।

तुम्हारी त्वचा
किसी कविता के कागज़ जैसी है—
नाज़ुक,
पर मजबूत—
और मैं
उस पर
अपना नाम नहीं,
अपनी इज़्ज़त लिखता हूँ।

तुम्हारी सांस
मेरे पास आती है
तो मुझे लगता है—
दुनिया की सारी लड़ाइयाँ
कहीं दूर रह गईं।

मैंने प्रेम को
कई जगह
अधूरा देखा है,
कई जगह
मालिकाना देखा है—
पर तुमने मुझे
सिखाया है
कि प्रेम
छीनता नहीं…
ठहरता है।

आज मैं तुम्हें
किसी वादे में नहीं बाँधता,
मैं तुम्हें
किसी शर्त में नहीं रखता—
मैं बस
तुम्हारे पास
अपनी सच्चाई रख देता हूँ।

और अगर तुम
मुझे अपने करीब आने दो,
तो समझना—
ये सिर्फ शरीर नहीं,
ये आत्मा का
विश्वास है।

आज रात
हमारे बीच
एक कविता तैरती रहे—
बिना नंबर की,
बिना नाम की…
बस महसूस होने वाली।

और सुबह…
जब रौशनी लौटे,
तो भी
वो कविता
हमारे भीतर
चुपचाप गूंजती रहे।

— पुष्प सिरोही

हमारे बीच की खामोशी
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