अब शांत समुद्र नहीं,
प्रलय की लहर हूँ मैं।
जिसे तुमने कमज़ोर समझा,
उसी मौन की दहाड़ हूँ मैं।
मेरे रास्ते में दीवारें हैं,
तो दीवारों का अंत लिखूँगा,
जो अँधेरा राह रोक रहा है,
उसके माथे पर भोर लिखूँगा।
मैं राख से उठने वाला
कोई साधारण अंगार नहीं,
मैं वह ज्वाला हूँ
जिसे आँधियाँ भी बुझा नहीं सकतीं।
जो मेरे धैर्य को भय समझ बैठे,
उन्हें समय का अर्थ बताऊँगा,
जो मेरी चुप्पी को हार समझे,
उन्हें अपने कर्मों का उत्तर दिखाऊँगा।
न मुकुट की चाह मुझे,
न किसी सिंहासन का अभिमान—
बस अन्याय के सामने
अडिग खड़े रहने का प्रण है।
मैं टूटूँगा तो शोर नहीं होगा,
मैं उठूँगा तो इतिहास बदलेगा—
आज मेरी परीक्षा है,
कल मेरा परिचय स्वयं समय देगा। ⚔️🔥
मैं क्रोध नहीं—
अन्याय के विरुद्ध जागा हुआ विवेक हूँ। ⚖️
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