दया नहीं—जीत Poem by Pushp Sirohi

दया नहीं—जीत

मैं किस्मत की बात नहीं करता,
क्योंकि किस्मत
कमज़ोरों का
सबसे खूबसूरत बहाना है।

मैं दुआ नहीं मांगता—
मैं लड़ता हूँ।
मैं उम्मीद नहीं पालता—
मैं हमला करता हूँ।

कामयाबी
किसी नरम दिल का इनाम नहीं,
वह उस आदमी का फल है
जो खुद पर
रोज़ जुल्म कर सके।

अगर तुम थक गए,
तो समझो
तुम्हारे दुश्मन ने
एक कदम जीत लिया।

और दुनिया?
दुनिया तुम्हारे दर्द पर
कविता नहीं लिखेगी—
दुनिया
तुम्हारी हार पर
हँसेगी।

इसलिए
मैं अपने आलस को
जिंदा नहीं छोड़ता।
मैं हर सुबह
अपने भीतर के
कमज़ोर आदमी को
मार देता हूँ।

जो लोग कहते हैं
"आराम भी ज़रूरी है"—
मैं कहता हूँ,
आराम
कब्रिस्तान की आदत है।

सफलता
दया नहीं समझती।
वह केवल
परिणाम पहचानती है।

रातें
अगर सोने में चली गईं,
तो जिंदगी
किसी और की हो जाएगी।

तुम्हारा कोई दोस्त नहीं है,
तुम्हारा कोई समय नहीं है,
तुम्हारी कोई "मूड" वाली जिंदगी नहीं है—
या तो तुम जीतो,
या तुम
गुम हो जाओ।

मैंने तय किया है—
मैं हारने वालों में नहीं रहूँगा।
मैं वो नहीं बनूँगा
जो कोशिश करके भी
घर लौट आए।

मैं वो बनूँगा
जिसे रोकना पड़े
दुनिया को—
क्योंकि वो
बहुत आगे निकल गया।

याद रखो—
दया
कमज़ोरों के लिए होती है।
जीत
भूखे, पागल, जिद्दी लोगों के लिए।

और मैं?
मैं दया नहीं,
जीत चुनता हूँ।

— पुष्प सिरोही

दया नहीं—जीत
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