वादों का हिसाब Poem by Pushp Sirohi

वादों का हिसाब

वो वादे जो साथ मरने के थे
वो वादे ही सबसे पहले मरे

मैंने हर लफ़्ज़ पर यक़ीन किया
उसने हर सच से इनकार किया

जो कहा था, वो निभा न सका
जो निभाया, वो समझा न सका

मक़्ता:
हिसाब रखना भी गुनाह बन गया
जब इश्क़ में था पुष्प

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