कभी हाथ में डमरू था,
आवाज़ दूर तक जाती थी,
आज हाथ में हॉर्न है,
पर संसद फिर भी सो जाती है।
डमरू से हॉर्न तक,
सफ़र सिर्फ़ साधनों का नहीं,
सवाल वही पुराने हैं—
सत्ता का, समाज का,
और जनता के अधिकारों का कहीं।
विपक्ष की आवाज़
जब तर्क बनकर उठती है,
तो लोकतंत्र की दीवारों पर
नई बहस लिखती है।
हॉर्न कितना भी तेज़ हो,
अगर दिशा नहीं होगी,
तो शोर तो होगा—
पर जन-आवाज़ नहीं होगी।
इसलिए डमरू हो या हॉर्न,
मंच हो या संसद का द्वार—
विपक्ष की असली शक्ति
शोर नहीं, सवाल हैं हजार।
डमरू से हॉर्न तक—
आवाज़ बदली है,
पर लोकतंत्र में
सवाल पूछने की ज़रूरत
आज भी वही है।
— Pushp Sirohi
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