संयोग एक मुस्कान Poem by Pushp Sirohi

संयोग एक मुस्कान

मैं तुम्हें ढूँढने नहीं निकला था,
मैं तो बस
अपने दिन को
सामान्य सा जी रहा था।

सड़क वही थी,
हवा वही थी,
भीड़ वही—
पर अचानक
सब कुछ बदल गया,
जब तुम
मेरे सामने आ गए।

यह मुलाक़ात
किसी योजना का हिस्सा नहीं थी,
यह तो
भाग्य की मुस्कान थी—
एक छोटा-सा
चमत्कार।

मैंने तुम्हें देखा,
और मेरी दुनिया ने
अपनी रफ़्तार
धीमी कर ली।

तुमने मुस्कुरा दिया,
और मेरे भीतर
कहीं एक
खाली जगह
भरने लगी।

मैं सोचता हूँ—
कितने लोग
हर रोज़
पास से गुज़रते हैं,
और फिर भी
किसी की नज़र
किसी को नहीं पकड़ती।

और तुम…
तुम्हारी नज़र ने
मुझे
उसी पल
"मेरा" बना लिया।

संयोग भी
कभी-कभी
नसीब से बड़ा होता है,
क्योंकि वह
बिना बताए
ज़िंदगी को
कविता बना देता है।

— पुष्प सिरोही ✨

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