नन्हा-सा परिंदा Poem by Pushp Sirohi

नन्हा-सा परिंदा

सर्द हवा के काँपते होंठों पर
शाम ने राख-सा रंग मल दिया,
पेड़ों की नंगी उँगलियाँ
आसमान की पसलियाँ गिनती रहीं।

धरती थकी हुई किताब थी—
जिसके हर पन्ने पर
बीते दिनों की धूल जमी थी,
और भविष्य…
किसी बंद दरवाज़े के पीछे
धीमे-धीमे मरता उजाला।

लोग—
अपने-अपने भीतर
एक ठंडी चुप्पी ओढ़े,
जैसे जीवन का दीप
सिर्फ रस्म निभा रहा हो।

मैं भी वहीं था—
खड़ा हुआ,
एक ऐसे मौसम में
जहाँ उम्मीद
लज्जित होकर
नज़रें झुका लेती है।

और तभी—
उस मृत-सी फिज़ा के बीच
एक नन्हा-सा परिंदा
टूटे हुए काँटे पर बैठकर
गाने लगा…

उसका स्वर
किसी उजड़े मंदिर की घंटी-सा था,
किसी भूले हुए घर की देहरी पर
लौट आई रौशनी जैसा।

न उसमें महल थे,
न वादे थे,
न जीत की कोई खबर—
बस एक अजीब-सी ज़िद थी,
कि अंधेरा
अंत नहीं होता।

मैं सुनता रहा—
और सोचता रहा,
इस ठंडी दुनिया को
वो क्या दिख गया
जो हमें नहीं दिखता?

शायद—
जीवन की मिट्टी में
अब भी कहीं
एक बीज साँस ले रहा है,
शायद—
दुख की रात के भीतर
कोई सुबह
धीरे-धीरे जन्म ले रही है।

और मैंने पहली बार
सर्द हवा से कहा—
"तू कितना भी काट ले,
मैं टूटूँगा नहीं…"

क्योंकि
एक परिंदे की छोटी-सी धुन ने
मेरे भीतर
उम्मीद का नाम
फिर से लिख दिया।

— Pushp Sirohi

नन्हा-सा परिंदा
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