शूद्र और समाज Poem by Pushp Sirohi

शूद्र और समाज

१. गलियों का शोर और जीवन की रफ्तार
सड़कों और गलियों में देखो, मचा हुआ कैसा शोर है,
हॉर्न की तीखी आवाजों से, गूंज रहा चारों ओर है।
फेरीवाले ठेले वाले, रोज लगाते अपनी आवाज यहाँ,
आवारा पशुओं की ठोकर से, बिखरे बिखरे हालात यहाँ।

२. किसान, शूद्र और श्रम की हुंकार
किए पसीना एक खेत में, भूखा पेट भरे जो सबका,
वही शूद्र और मेहनतकश, हक मांग रहा है अब अपना।
किसान खड़ा है धूप-छांव में, लेकर अपनी पूरी ताकत,
सड़कों पर यह गूंज रही है, सदियों की टूटी लाचारी आफत।

३. राजनीति, प्रशासन और भ्रष्टाचार की परतें
राजनीति के गलियारों में, कुर्सी की कैसी दौड़ मची,
प्रशासन की फाइलों के भीतर, बेईमानी की पोल खुली।
भ्रष्टाचार की दीमक ने, जनता का खून चूस डाला,
पर अब इस अन्याय के आगे, हर दिल में जलता उजाला।

४. महिला सशक्तिकरण और एंड्रॉइड मोबाइल की ताकत
हाथों में अब एंड्रॉइड मोबाइल, दुनिया मुट्ठी में लाती है,
शूद्र नारी और बेटियाँ अब, आसमान में उड़ जाती हैं।
शिक्षा और तकनीक के बल पर, बदल रही तकदीर यहाँ,
महिला सशक्तिकरण की गूंज से, कांपी हर एक जंजीर यहाँ।

५. नया सवेरा और क्रांति का पथ
शोर मचेगा, हक मिलेगा, अब कोई न छुप पाएगा,
सड़कों से लेकर संसद तक, नया जमाना आएगा।
श्रम, तकनीक और समता का, ऐसा सूर्य जो चमकेगा,
इस 'शूद्र और समाज' के पथ पर, न्याय हमेशा महकेगा!

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