पुरुष एक शौर्य की आग Poem by Pushp Sirohi

पुरुष एक शौर्य की आग

मैं अधूरा नहीं—
मैं पूर्ण हूँ।
मेरे भीतर
तप का धुआँ है,
और धैर्य की नदी।

मैंने अपने लहू से
अपने भाग्य की सियाही गढ़ी है,
और अपनी पीठ पर
समय की कोड़े
हँसकर सहे हैं।

मेरे माथे पर
संस्कार की राख है,
मेरे सीने में
शौर्य की आग;
मैं वह पुरुष हूँ
जो आँधियों से
रास्ते नहीं पूछता—
आँधियों को
रास्ता दिखा देता है।

मैंने
जिन रातों में
अपने ही नाम को
कफ़न-सा ओढ़ लिया था,
उन्हीं रातों से
सवेरे का
सूरज छीना है।

मेरी ख़ामोशी
कमज़ोरी नहीं—
वह हिकमत है;
और मेरी आँखों की
स्थिरता में
क़यामत की
इबारत लिखी है।

मैं प्रेम करता हूँ
तो इबादत की तरह—
मगर अपनी इज़्ज़त को
किसी की दहलीज़ पर
सौदा नहीं बनाता।

जिसे मेरा साथ चाहिए—
वह मेरी हक़ीक़त से मिले,
मेरी रूह की
सदाक़त से मिले;
मेरे भीतर
अहंकार नहीं,
अस्मिता का सिंहासन है।

मैं किसी के
नखरों का
क़ैदी नहीं—
मेरी मर्दानगी
वफ़ा से चमकती है,
और मेरी मूकता में
प्रहार पलता है।

यदि तुम्हें चाहिए
एक ऐसा पुरुष
जो संकल्प को
शरीर में
धड़कन बना दे—
तो लौट आओ।

पर यदि तुम्हारा मन
क्षणिक खेलों में ही रमता है,
तो जाओ—
उन खिलौनों के पास
जिनके भीतर
न दर्द है,
न धर्म,
न दहाड़।

मैं खिलौना नहीं—
मैं यथार्थ हूँ;
मैं वह पर्वत हूँ
जिसकी चोटी पर
वक़्त भी
सर झुकाकर चलता है।

और सुनो—
मैं तुम्हें पाने को
न टूटूँगा,
न झुकूँगा;
मैं बस
अपनी ऊँचाई में
और ऊँचा उठूँगा।

क्योंकि
मैं अधूरा नहीं—
मैं पूर्ण हूँ।
पूर्ण पुष्प।

— पुष्प सिरोही

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