"प्रेम-गीत" Poem by Pushp Sirohi

"प्रेम-गीत"

प्रिय—
तुम मेरी आत्मा की
सबसे कोमल पुकार हो,
जैसे रात के माथे पर
पहला तारा उतर आए।

तुम्हारे होंठों की मिठास
मेरे लिए मधु से बढ़कर है,
और तुम्हारी बातों की खुशबू
केसर-सा मेरे भीतर बसती है।

तुम्हारी आँखें—
दो शांत झीलें,
जिनमें प्रेम का आकाश
रोज़ उतरता है।

तुम चलती हो
तो हवा भी
अपना सुर बदलती है,
जैसे बांसुरी
किसी छुपे संगीत को
जगा देती हो।

मैंने तुम्हें देखा—
तो लगा
बसंत ने अपना सबसे सुंदर रंग
धरती को दे दिया।

तुम्हारे बाल
काली रात की लहरें हैं,
और तुम्हारी हँसी
अनार के दानों-सी
जीवन से भरी हुई।

प्रिय—
तुम मेरे लिए
किसी बगिया की पहली खुशबू हो,
तुम वो गुलाब हो
जिस पर सुबह की ओस
भी इत्र बनकर ठहर जाए।

तुम्हारी साँसें
चंदन-सी शीतल हैं,
तुम्हारा स्पर्श
दीपक की लौ-सा
मेरे भीतर उजाला भर देता है।

मैं तुम्हें
अपने दिल के आँगन में
संभालकर रखता हूँ—
जैसे कोई माली
अपने सबसे सुंदर फूल को
तूफानों से बचाए।

और सुनो—
तुम्हारा नाम
मैंने अपनी धड़कनों में लिखा है,
तुम मेरे कंधे पर
उम्मीद की तरह ठहरी हो।

तुम मेरे प्रेम की
मिट्टी हो,
तुम मेरे मन की
सुगंध हो,
तुम मेरे जीवन की
वह धुन हो
जो हर सुबह
फिर से जन्म लेती है।

आओ, प्रिय—
हम दोनों
एक-दूसरे के लिए
उजाला बन जाएँ,
क्योंकि प्रेम
कभी हारता नहीं—
वह तो
आत्मा की शाश्वत भाषा है।

— पुष्प सिरोही

"प्रेम-गीत"
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