आँधियों के पार Poem by Pushp Sirohi

आँधियों के पार

एक दिन
डर ने धीमे से कहा—
"यहीं रहो,
यहीं सुरक्षित हो।"

पर आत्मा ने उत्तर दिया—
"सुरक्षा भी कभी-कभी
कैद बन जाती है।"

जब कली को समझ आया
कि बंद रहना आसान है,
पर खिलना ही जीवन है—
तब उसने
अपने ही खोल से
युद्ध छेड़ दिया।

काँटे थे,
हवा थी,
आँधियाँ थीं—
पर उसने
पहली बार
सूरज को छूना चाहा।

और उसी पल
जोखिम
प्रार्थना बन गया।

क्योंकि
दर्द कभी-कभी
सजा नहीं,
जन्म होता है।

जो रुक गया
वो बच तो गया,
पर मर गया भीतर से—
और जो चल पड़ा,
वो टूट भी गया,
पर
फिर से बन गया।

— पुष्प सिरोही

आँधियों के पार
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