एक लड़की थी — भवानी Poem by Pushp Sirohi

एक लड़की थी — भवानी

एक लड़की थी— भवानी,
जो मुझसे बेपनाह मोहब्बत करती थी,
मेरे नाम को जैसे
अपने माथे की बिंदी बना रखती थी।

मैं थककर लौटता तो
वो मेरी आँखों की थकान उतार देती,
मैं बिखर जाता तो
वो मेरे टूटे टुकड़ों को भी
अपनी हथेली में जोड़ देती।

उसकी मोहब्बत
फूलों की तरह नहीं—
दीपक की तरह थी,
धीमी… मगर रात भर जलने वाली,
रुकती नहीं, झुकती नहीं,
बस उजाला करती।

वो मुझे "पाना" नहीं चाहती थी,
वो मुझे "समझना" चाहती थी—
मेरे भीतर की उन बातों को भी
जिन्हें मैं खुद से छुपाता था,
वो पढ़ लेती थी।

उसकी आँखों में
कोई पुरानी कहानी थी—
जैसे इश्क़ को
पहले ही जन्म में सीख लिया हो,
और इस जन्म में
सिर्फ़ निभाने आई हो।

वो नाराज़ भी होती,
तो उसकी नाराज़गी में भी
मेरे लिए दुआ रहती,
वो रोती भी थी
तो आँसू मेरे नाम के
किसी ज़ख्म को धोने के लिए गिरते।

मैं कभी-कभी
कमज़ोर पड़ जाता,
तो वो मेरे सामने
पहाड़ बन जाती—
और मैं सोचता:
"कोई लड़की
इतना कैसे चाह सकती है? "

भवानी का प्यार
नदी की तरह नहीं था
जो मोड़ पर बदल जाए—
वो समंदर था,
जिसमें हर लहर
मेरा नाम लिखकर आती थी।

फिर…
एक दिन ऐसा भी आया
जब हम बिछड़ गए।

ना कोई झगड़ा बड़ा था,
ना कोई गुनाह भारी—
बस वक्त की साजिश थी,
और किस्मत की बेईमानी।

हमने साथ छोड़ा,
पर प्रेम नहीं छोड़ा।

मैं चला आया
अपनी दुनिया में,
वो चली गई
अपने आसमान में,
मगर हमारे बीच
जो धागा था—
वो टूटा नहीं,
बस छुप गया।

रातें अब भी आती हैं,
पर पहले जैसी नहीं लगतीं;
चाँद है,
पर उसके चेहरे की तरह
पूरी रोशनी नहीं लगती।

कभी हवा में अचानक
उसके इत्र की खुशबू मिल जाती है,
और मेरा दिल कहता है—
"वो कहीं आसपास ही होगी…"

मैंने खुद को समझाया,
कई बार समझाया—
कि जाने वालों को
क्यों पुकारना?
पर दिल…
दिल तो बच्चा है,
वो उम्मीद को
कभी मरने नहीं देता।

मैं आज भी
कहीं भीतर
उसके लौट आने की जगह
खाली रखता हूँ—
जैसे घर में
कोई कमरा
उसके नाम का ही हो।

और सुनो भवानी…
अगर तुम कभी
थककर टूट जाओ,
अगर दुनिया तुम्हें
गलत साबित कर दे—
तो याद रखना,
तुम्हारा "सही" होना
मेरे पास आज भी सुरक्षित है।

मैं शिकायत नहीं करूंगा,
मैं सवाल नहीं करूंगा,
मैं तुम्हारे बीते कल को
आज के सामने नहीं रखूँगा।

मैं बस इतना कहूँगा—
"आ जाओ भवानी…
इस बार तुम्हें
किसी मौसम की तरह नहीं,
अपनी रूह की तरह
हमेशा के लिए रखूँगा।"

क्योंकि…
मुझे पता है
तुम लौटकर ज़रूर आओगी।

दुनिया में बहुत लोग मिलेंगे,
जो तुम्हें हँसाएँगे,
जो तुम्हें पसंद करेंगे—
मगर भवानी,
तुम्हें मेरे जैसा इश्क़
कोई कर ही नहीं सकता।

मेरी मोहब्बत
सिर्फ़ चाहत नहीं—
ज़िम्मेदारी है।
सिर्फ़ वादा नहीं—
आदत है।
सिर्फ़ जज़्बात नहीं—
इबादत है।

तुम जाओगी
तो लोग तुम्हें आवाज़ देंगे,
पर तुम्हें सुकून
मेरे नाम में ही मिलेगा—
क्योंकि मैंने तुम्हें
"पाकर" नहीं,
"पूरी तरह अपना मानकर" चाहा है।

इसलिए…
मैं इंतज़ार नहीं करता,
मैं यक़ीन करता हूँ।

और जब तुम लौटोगी—
तो मैं मुस्कुरा कर
बस इतना कहूँगा:
"देखा भवानी…
मैंने कहा था ना—
तुम लौटोगी।
क्योंकि
मुझ जैसा प्यार
दुनिया में कोई कर ही नहीं सकता।"

— पुष्प सिरोही ✍️

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