बसंत की परछाईं Poem by Pushp Sirohi

बसंत की परछाईं

तुमने पत्तों को गिरते देखा,
और तुम्हारी आँखें
अकारण भर आईं।
तुम्हें लगा
जैसे कुछ अपना
चुपचाप
विदा हो गया।

मैंने पूछा—
"इतनी उदासी क्यों? "
तुमने कहा—
"पेड़ खाली हो रहा है।"

पर सच यह है—
पेड़ खाली नहीं होता,
वह बदलता है।
वह हर मौसम में
अपना एक हिस्सा
धरती को दे देता है।

तुम्हारी उदासी
पत्तों के लिए नहीं थी,
वह उस बात के लिए थी
जिसे तुम
अभी शब्द नहीं दे पाए—
कि हर सुंदर चीज़
एक दिन
बदल जाती है।

बसंत आता है,
फिर पतझड़ आता है,
और बीच में
हम थोड़े बड़े हो जाते हैं।

और जब हम बड़े होते हैं,
तो समझते हैं—
पत्ते
धरती पर नहीं गिरते,
हमारे भीतर गिरते हैं।

हमारी मासूमियत,
हमारी हँसी,
हमारे "हमेशा" वाले वादे।

इसलिए
तुम्हारी आँखें भरती हैं—
क्योंकि तुम
पतझड़ में
अपने ही जीवन की
परछाईं देख लेती हो।

और यह दुख
कमज़ोरी नहीं,
यह तुम्हारे
जिंदा होने की
सबसे सुंदर निशानी है।

— पुष्प सिरोही

बसंत की परछाईं
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success