मैं आज
किसी उत्सव का गीत नहीं लिखता—
मैं आज
स्मृतियों के सामने
धीरे से सिर झुकाता हूँ।
क्योंकि कुछ नाम
काग़ज़ पर नहीं आते,
वे दिल पर उतरते हैं—
और फिर
सारी उम्र
धड़कनों की भाषा में
जिंदा रहते हैं।
तुम चले गए…
और दुनिया ने कहा—
"समय सब ठीक कर देगा।"
पर समय
कौन-सा इलाज है?
समय तो बस
कैलेंडर के पन्ने बदलता है,
मगर
मेरे भीतर का मौसम
वहीं ठहरा रहता है।
कभी-कभी
मुझे लगता है
तुम किसी यात्रा पर हो,
और बस थोड़ी देर में
लौट आओगे—
अपने उसी पुराने अंदाज़ में,
अपनी उसी सरल मुस्कान में।
फिर मैं
खुद को याद दिलाता हूँ—
कि कुछ यात्राएँ
वापसी का पता नहीं छोड़तीं।
मैंने तुम्हारी कमी को
छोटा करने की कोशिश की,
शब्दों में बाँधकर
समझदार बनने की कोशिश की—
पर शोक
किसी तर्क से नहीं मानता।
शोक
बस
एक खामोश समुद्र है,
जिसमें
हर दिन
कुछ यादें
लहर बनकर आती हैं।
कभी
रात के बीच
मैं उठ बैठता हूँ—
और मुझे लगता है
तुमने पुकारा है।
और जब
किसी कोने से
कोई आवाज़ नहीं आती,
तो मैं समझ जाता हूँ—
ये मेरी आत्मा है
जो अब भी
तुम्हें खोजती है।
तुम्हारी अनुपस्थिति
सिर्फ़ खालीपन नहीं—
यह एक भारी उपस्थिति है।
यह मेरे घर के भीतर
एक खाली कुर्सी है,
जो बोलती नहीं,
पर हर बात सुनती है।
यह मेरे जीवन की किताब में
एक अधूरा अध्याय है—
जिसका अंत
किसी के पास नहीं।
मैंने सीखा है
कि प्रेम
मरता नहीं।
शरीर जा सकता है,
आवाज़ रुक सकती है,
पर
जिसे हमने सच में चाहा—
वो हमारी नसों में
एक प्रकाश की तरह
बहता रहता है।
कभी मुझे लगता है
कि तुम
कहीं बहुत दूर नहीं हो—
बस
एक दूसरी हवा में हो।
कहीं ऐसे आकाश में
जहाँ दुख की भाषा नहीं,
जहाँ बिछड़ने की सजा नहीं,
जहाँ समय
घाव नहीं बनाता।
और फिर भी…
मैं मनुष्य हूँ,
और मेरा दिल
कभी-कभी
कमज़ोर हो जाता है।
मैं कह बैठता हूँ—
"क्यों? "
क्यों अच्छे लोग
इतनी जल्दी चले जाते हैं?
क्यों उजाले
इतनी जल्दी बुझते हैं?
क्यों कुछ रिश्ते
दुआ बनकर भी
पूरे नहीं होते?
लेकिन हर "क्यों" के बाद
तुम्हारी याद
मेरे भीतर से कहती है—
"मैं गया नहीं…
मैं बस
तुम्हारे प्रेम में
स्थायी हो गया हूँ।"
अब मैं तुम्हें
कब्र में नहीं खोजता।
मैं तुम्हें
उन आदतों में खोजता हूँ
जो तुमने मुझे दीं।
मैं तुम्हें
उन फैसलों में खोजता हूँ
जो अब भी
तुम्हारी सीख से बनते हैं।
मैं तुम्हें
मेरी अच्छाई के हर उस पल में खोजता हूँ
जहाँ मैं
किसी को टूटने से बचा लेता हूँ—
क्योंकि तुम
कभी मुझे बचाते थे।
और यही
सबसे गहरी सच्चाई है—
कि तुम्हारे जाने के बाद भी
तुम
मेरे भीतर
रुक गए हो।
तो आज
मैं इस शोक को
कमज़ोरी नहीं कहता।
मैं इसे
प्रेम की मुहर कहता हूँ।
क्योंकि
जो दिल
सच में प्रेम करता है,
वो दिल
सच में शोक भी करता है।
और जो शोक
इतना सच्चा हो—
वो बताता है
कि प्रेम
कितना अमर था।
तुम्हारे नाम पर
मैं आज भी
अपनी रूह में
एक दीया जलाता हूँ।
और उस दीये की लौ
मुझसे कहती है—
"कुछ रिश्ते
समय के बाहर होते हैं।"
मैं भी मानता हूँ।
तुम गए हो—
लेकिन
मेरे प्रेम से नहीं।
मेरी दुनिया से नहीं।
मेरी धड़कनों से नहीं।
तुम स्मृतियों में नहीं—
तुम अर्थ में हो।
— पुष्प सिरोही
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