मैंने तुम्हें दिल से चाहा Poem by Pushp Sirohi

मैंने तुम्हें दिल से चाहा

मैंने
तुम्हें
प्यार नहीं किया
मैंने
तुम्हें
**आजाद किया

और जब तुम
उड़ने लगीं
तो मुझे
डर लगा

क्योंकि
मैंने पहली बार
किसी को
इतना अपना माना
कि उसे
खोने से
डरने लगा

पर फिर
मैंने देखा
तुम्हारी आँखों में
तुम्हारा सपना
तुम्हारी आग
तुम्हारी दुनिया

और मैं समझ गया
तुम्हें रोकना
प्यार नहीं
डर है

तो मैं
पीछे हट गया
ताकि
तुम आगे बढ़ सको

मैंने
अपनी हथेलियों को
तुम्हारी राह से हटाया
और अपनी आवाज़ को
तुम्हारी उड़ान का
गीत बना दिया

क्योंकि
अगर तुम
खुश नहीं
तो मेरा प्यार
झूठ है

और अगर तुम
पूर्ण हो
तो मेरा प्यार
सच है

तुम्हें
मुझे चुनना नहीं
तुम्हें
खुद को चुनना है

और फिर
अगर तुम लौटो
तो मैं
तुम्हें
एक ज़ख्म की तरह नहीं
एक सम्मान की तरह
थामूंगा

मैं चाहता हूँ
तुम
मुझसे प्रेम करो
पर मजबूरी से नहीं

चाहत से
इज्ज़त से
रौशनी से

क्योंकि
मैंने तुम्हें
दिल से चाहा है

और दिल
कैद नहीं करता
दिल
दुआ करता है

----पुष्प सिरोही

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