प्रिये—
अगर हमारे पास
अनंत समय होता,
तो मैं तुम्हें
धीरे-धीरे चाहता,
इतना धीमे
कि हर सांस
एक त्योहार बन जाती।
मैं तुम्हारी मुस्कान को
सदियों तक देखता,
तुम्हारी पलकों की
हर झपक में
एक नई कविता लिखता।
मैं तुम्हारे नाम को
नदी की तरह
लंबा बहने देता,
और तुम्हारे प्रेम को
समुद्र की तरह
गहरा होने देता।
अगर समय
हमारा नौकर होता,
तो मैं
तुम्हें पाने की जल्दी
कभी न करता।
पर सुनो…
समय
कहीं खड़ा नहीं रहता।
वह पीछे से
धीरे-धीरे नहीं,
तेज़ कदमों से आता है—
और हमारी जवानी के दरवाज़े पर
बिना दस्तक दिए
हाथ रख देता है।
मैंने समय की
ठंडी सांस
अपनी गर्दन पर महसूस की है,
मैंने कल को
आज में घुलते देखा है।
और मैंने ये भी जाना है—
जो प्रेम
आज नहीं जिया,
वो फिर
सिर्फ अफ़सोस बनकर
रह जाता है।
तुम कहती हो—
"थोड़ा ठहरो, "
"थोड़ा सोचो, "
"थोड़ा और वक्त हो, "
और मैं
तुम्हारी इस संकोच-सी सुंदरता को
भी चाहता हूँ,
पर मैं डरता हूँ—
कि कहीं ये संकोच
हमारी कहानी से
जीत न जाए।
प्रिये—
मैं तुम्हें
अधिकार से नहीं,
इजाज़त से चाहता हूँ।
मैं तुम्हें
जिद से नहीं,
इज़्ज़त से चाहता हूँ।
पर मैं ये भी जानता हूँ—
हमारी सांसें
उधार का संगीत हैं,
कल की कोई गारंटी नहीं।
इसलिए आज—
मैं तुम्हारे सामने
अपना दिल रखता हूँ:
चलो—
हम इस पल को
पूरा जी लें।
चलो—
हम अपने दिनों को
रोक नहीं सकते,
पर अपने प्यार को
अमर कर सकते हैं।
चलो—
हम हँसी को
अपने होंठों पर
अभी लिख लें,
क्योंकि कल
हो सकता है
होंठों पर
खामोशी हो।
मैं तुमसे कहता हूँ—
प्रेम को
टालो मत।
अगर तुम
मेरा हाथ थाम लो,
तो दुनिया
धीमी पड़ जाएगी,
और वक़्त
हमारे सामने
हार जाएगा।
क्योंकि जब दो दिल
सच में मिलते हैं,
तो पल
सदी बन जाते हैं—
और सदी
भी प्रेम से
छोटी लगती है।
— पुष्प सिरोही
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