मेरे दोस्तों,
दुश्मन को मारने के लिए
हथियार नहीं चाहिए—
कभी-कभी
बस खामोशी काफी होती है।
क्योंकि
जो सच तुमने नहीं कहा,
वही भीतर
ज़हर बनकर उगता है—
और फिर
वो ज़हर
जड़ें फैलाता है।
मैंने क्रोध को
चिल्लाकर नहीं निकाला—
मैंने उसे
धीरे-धीरे पाला।
मैंने उसे
हर अपमान की मिट्टी में बोया,
हर धोखे की बारिश में सींचा,
और हर रात
अपनी आँखों की आग से
उसकी जड़ें और गहरी कीं।
दुश्मन समझता रहा
मैं कमज़ोर हूँ—
क्योंकि मैं शांत था।
वो नहीं जानता था
कि शांति
अक्सर
कब्र की तैयारी होती है।
मैं हँसा,
और हँसी के पीछे
मैंने नफरत छुपाई।
मैंने हाथ मिलाया,
और उस स्पर्श के भीतर
अपना फैसला दबाया।
मैंने कहा—
"सब ठीक है, "
और उसी झूठ ने
मेरे भीतर
जहर की जड़ें उगा दीं।
फिर एक दिन
मेरे भीतर
एक पेड़ खड़ा हो गया—
काला,
शांत,
और घातक।
उसके पत्ते
मेरी योजनाएँ थे,
उसकी छाल
मेरी प्रतीक्षा थी,
और उसकी जड़ें—
उसकी जड़ें
मेरे धैर्य का
सबसे खतरनाक रूप थीं।
मैंने दुश्मन को
सीधा नहीं तोड़ा—
मैंने उसे
अपने ही घमंड से
काट दिया।
मैंने उसे
अपने ही लालच से
फँसा दिया।
मैंने उसे
अपने ही अहंकार की
रस्सी से
लटका दिया।
और वो आया…
रात के अंधेरे में,
मुझे देखने नहीं—
मुझे गिरते देखने।
वो आया
मेरी हार देखने,
मेरे दुख का तमाशा देखने।
पर उसे क्या पता—
मैंने तो
उसके लिए
अपने भीतर
एक मौत तैयार कर रखी थी।
वो जैसे ही
मेरे पास आया,
वो जड़ें
उसके पैरों से लिपट गईं।
उसने संघर्ष किया,
पर जड़ें
बहुत धैर्यवान थीं।
क्योंकि
जड़ें
शोर नहीं करतीं—
वो दबाकर मारती हैं।
फिर
उसके सामने
मेरे भीतर का पेड़
फल लाया—
चमकदार,
मीठा दिखता,
और बेहद सुंदर—
जैसे मौका,
जैसे दोस्ती,
जैसे भरोसा।
वो मुस्कुराया…
और उसी मुस्कान में
अपनी कब्र चुन ली।
उसने फल खाया—
और समझा
कि जीत उसी की है।
पर ज़हर
धीरे काम करता है।
ज़हर
पहले
सोच को मारता है,
फिर
हिम्मत को,
और अंत में
सांसों तक उतरता है।
सुबह
मैंने उसे देखा—
शांत,
गिरा हुआ,
टूटे हुए गुरूर की तरह।
और मेरे चेहरे पर
कोई खुशी नहीं थी…
बस
एक ठंडा-सा सच था—
जो मेरे खिलाफ़ खड़ा हुआ,
वो खुद अपने अंत पर खड़ा था।
पर सुनो…
दुश्मन का विनाश
सबसे आसान है,
सबसे मुश्किल है—
अपने भीतर के ज़हर को
खुद को मारने से रोकना।
क्योंकि
जो ज़हर
दुश्मन को डुबोता है,
अगर संभाला न जाए—
वो
तुम्हारी आत्मा को
भी काला कर देता है।
इसलिए
मैंने जड़ों को
बस उतना ही बढ़ने दिया—
जितना जरूरी था।
मैंने ज़हर को
बस उतना ही जीने दिया—
जितना जरूरी था।
और फिर
मैंने अपने भीतर
एक और बीज बोया—
विवेक का।
क्योंकि
मेरा मकसद
क्रूर बनना नहीं—
मेरा मकसद
अजेय बनना है।
और अजेय वही होता है
जो दुश्मन को भी तोड़ दे
और खुद को भी
बचा ले।
यही है—
ज़हर की जड़ें।
-पुष्प सिरोही
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